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हिंदी अंक (देवनागरी) || Hindi digits/numbers

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हिंदी के मानकीकरण के अनेक अदूरदर्शी प्रयासों ने आज हिंदी के अंको की स्थिति यह कर दी है कि सामान्य शिक्षार्थी तो क्या हिंदी के शिक्षक भी हिंदी (देवनागरी) में लिखी संख्याओं को पढ़ने में अचकचा जाते हैं। एकरूपता के चक्कर में या थोड़े से आलस्य के कारण अथवा कदाचित किसी कुचक्र में फँसकर हम अपनी जड़ों से कैसे कटते जा रहे हैं शायद हमें कभी इस पर विचार करने की फुरसत नहीं मिली? आज से २० साल बाद जब हमारे बच्चे किसी पुरानी पुस्तक में लिखी हिंदी की गिनतियाँ समझ पाने में असमर्थ होंगे तो आखिर हम किसको दोष देंगे? रोमन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंक कहकर क्या हमने यह मान लिया है कि हिंदी के अंक अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हो पाने की योग्यता ही नहीं रखते? और इसलिए क्या हम देवनागरी के अंकों को तिलांजलि दे दें? ज़रा इन प्रश्नों पर विचार करें।
हमारे नीति-नियंताओं ने आजादी के बाद से अब तक हिंदी को दयनीय दशा में पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय देश के जनजन की आवाज बनकर गूँजने वाली हिंदी आज सत्तर साल बीत जाने के बाद भी संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त पायी है। हिंदी को उ…

इस पार प्रिये, मधु है तुम हो || love Poem 'iss paar uss paar

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'इस पार उस पार' हरिवंशराय बच्चन जी का सुंदर प्रणय गीत है। कवि प्रेयसी से, स्वयं से या कहें हम सब से कहता है- इस पार प्रिये मधु है, तुम हो; उस पार न जाने क्या होगा! और विषद अर्थों में यह जीवन का सूत्र है कि प्रियतम के बिना संसार सारहीन है। प्रेम के बिना सारा जग सारहीन है, निरर्थक है और जहाँ प्रेम है वहीं जीवन की सार्थकता है।
आइये पढ़ते हैं बच्चन जी की यह प्रसिद्ध कविता-

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
यह चाँद उदित होकर नभ में, कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरा-लहरा यह शाखाएँ, कुछ शोक भुला देतीं मन का, कल मुर्झाने वाली कलियाँ, हँसकर कहती हैं मगन रहो, बुलबुल तरु की फुनगी पर से, संदेश सुनाती यौवन का, तुम देकर मदिरा के प्याले, मेरा मन बहला देती हो, उस पार मुझे बहलाने का, उपचार न जाने क्या होगा!
इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!
जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है, जीवन की झिलमिलसी झाँकी, नयनों के आगे आती है, स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे, मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है! ऐसा सुनता, उस पार प्रिये, ये स…

मेरा प्यार भी अजीब था || Ye jo ishq hai

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ये जो इश्क है वो जूनून है, वो जो न मिला वो नसीब था।
वो पास हो के भी दूर था, या दूर हो के करीब था ।।

मेरे हौसले का मुरीद बन या दे मुझे तू अब सजा।
तू ही दर्श था तू ही ख्वाब था, तू ही तो मेरा हबीब था।।

उस शहर की है ये दास्ताँ, जहाँ बस हमी थे दरमियाँ।
न थी दुआ, न थी मेहर, न तो दोस्त था न रकीब था।।

करता रहा दिल को फ़ना, जिसे लोग कहते थे गुनाह।
एक अजनबी पे था आशना, मेरा प्यार भी अजीब था।।

'अज्ञात'

तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या : एक प्रेम कविता || Love Poem

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प्रेम, रहस्यवाद और उस अज्ञात प्रियतम से एकाकार हो जाने के भावों को अभिव्यंजित करती हुई महादेवी वर्मा की एक सुंदर कविता-

तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या? तारक में छवि, प्राणों में स्मृति, पलकों में नीरव पद की गति, लघु उर में पुलकों की संसृति,            भर लाई हूँ तेरी चंचल!            और करूँ जग में संचय क्या?
तेरा मुख सहास अरुणोदय, परछाई रजनी विषादमय, वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,            खेल खेल थक थक सोने दे!            मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?
तेरा अधर विचुंबित प्याला तेरी स्मित मिश्रित हाला, तेरा ही मानस मधुशाला,            फिर पूछूँ क्या मेरे साकी!            देते हो मधुमय विषमय क्या?
रोम रोम में नंदन पुलकित, साँस साँस में जीवन शत शत, स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित,            मुझमें नित बनते मिटते प्रिय!            स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या?
हारूँ तो खोऊँ अपनापन पाऊँ प्रियतम में निर्वासन, जीत बनूँ तेरा ही बंधन,            भर लाऊँ सीपी में सागर!            प्रिय मेरी अब हार विजय क्या?
चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम, मधुर राग तू मैं स्वर संगम, तू असीम मैं सीमा का …

वायु प्रदूषण और पीएम 2.5 | PM2.5

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वायु प्रदूषण और पीएम 2.5  ऐसे शब्द हैं जो इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। आइये हम वायु प्रदूषण के ही सन्दर्भ में पीएम 2.5 के बारे में जानते हैं। 
वायुमण्डल हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण भाग है। वायुमण्डल से ही हम अपने जीवन के लिए अनिवार्य प्राणवायु ग्रहण करते हैं जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में ऑक्सीजन (O2) के नाम से जाना जाता है। यह प्राणवायु हमारे लिए कितनी आवश्यक है इस बात का अनुमान ऐसे कर सकते हैं कि-
"बिना भोजन के हम २० दिनों तक जीवित रह सकते हैं। बिना जल के ७ दिनों तक जीवित रहा जा सकता है। किन्तु प्राणवायु के अभाव में मनुष्य ७ मिनट भी जीवित नहीं रह सकता।"
यही प्राणदायिनी वायु आज इतनी विषैली होती जा रही है कि हमारे प्राणों के लिए ही घातक बन गयी है।
इन दिनों ये ख़बरें लगातार सुर्ख़ियों में हैं कि भारत के अमुक राज्य में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। चारों तरफ स्मॉग फैला हुआ है। पूरा परिक्षेत्र गैस चैम्बर में तब्दील हो गया है। स्कूल, कॉलेज तक बंद करने की नौबत आ गयी है। इस दौरान वायु में पीएम2.5 की मात्रा मानक से १० गुना तक ज्याद…

जिसने पाप न किया हो

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बात बहुत पुरानी है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही न्यायप्रिय था। उसके राज्य में अपराधियों के लिए कड़े दण्ड का प्रावधान था। चोरों को फाँसी पर लटका दिया जाता था।

एक बार एक चोर को चोरी करते हुए पकड़ा गया। अपराध सिद्ध होने पर राजा ने चोर को नियमानुसार फाँसी की सजा सुनाई। चोर सजा भुगतने के लिए सहर्ष तैयार हो गया लेकिन उससे पहले उसने राजा से कहा हुजूर मैं एक गुप्त विद्या जानता हूँ जो मैं मारने से पहले आपको सिखाकर जाना चाहता हूँ। ताकि यह विद्या मेरे मरने साथ खत्म न हो जाय। महाराज मैं सोने की खेती करना जानता हूँ।

राजा ने चोर को अपने पास बुलवाया और पूछा- सोने की खेती कैसे की जाती है? बताओ! चोर बोला- महाराज! सवा किलो सोने के, मटर के बराबर दाने सुनार से बनवाकर मँगा दीजिए। मैं राजमहल की चहारदीवारी में ही क्यारी बनाकर उन्हें बोउँगा। जब तक सोने के दाने आएँगे, तब तक मैं क्यारियाँ तैयार कर लूँगा। राजा ने चोर की बात मान ली और सोने के बीज तैयार करने का आदेश दे दिया। इधर चोर ने फावड़ा लिया, फावड़े से मिट्टी खोदी। फिर खुरपी और हाथों की सहायता से मिट्टी तैयार की। तब तक सोने के दाने भी आ गए।

प्रेम की उत्कृष्ट कविता | Love poem - रात आधी खींच कर मेरी हथेली

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"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती" का सुंदर संदेश देने वाले प्रख्यात कवि और लेखक 'हरिवंश राय बच्चन' का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनकी लोकप्रिय कृति 'मधुशाला' की पंक्तियाँ हर साहित्य प्रेमी की जुबान पर होती हैं। सूफी दर्शन से ओतप्रोत 'मधुशाला' एक ऐसी अनुपम कृति है जिसकी प्रसिद्धि के आयाम को २०वीं सदी के बाद की कोई दूसरी रचना अब तक नहीं प्राप्त कर पायी है।
मधुशाला के अलावा भी भी उनकी अन्य रचनाएँ जैसे मधुकलश, निशा निमंत्रण, धार के इधर उधर, मिलन यामिनी, आकुल अंतर, प्रणय पत्रिका इत्यादि सब एक से बढ़कर एक हैं और सभी रचनाएँ भाव और शिल्प दोनों ही दृष्टिकोण से श्रेष्ठ हैं
लेकिन दोस्तों, आज हम यहाँ बात कर रहे हैं उनकी एक ऐसी कविता की जो शायद हिंदी साहित्य में लिखे गए सर्वश्रेष्ट प्रेम गीतों में स्थान पाने की योग्यता रखती है। प्रेम और वेदना की जिस भाव-भूमि पर उतर कर कवि ने इस कविता को रचा है वह किसी भी सहृदय के के मन के तारों को झंकृत कर देने के लिए काफी है।सोने पे सुहागा यह कि इसका शिल्प-विधान और शब्द चयन भी उनकी अन्य रचनाओं की तरह ही उत्कृष्ट है। यह बात …

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