Skip to main content

Posts

तुम्हारा दुपट्टा सरकता था

"तूने मेरी मोहब्बत की गहराईयों को समझा ही नहीं सनम..!
तेरे बदन से जब दुपट्टा सरकता था हम अपनी नज़रें झुका लेते थे..!!"

  ऐसे ही कहीं कुछ पढ़ रहा था और नज़र पड़ गयी इन पंक्तियों पर।
प्रथमदृष्टया कोई भी इसे उस सस्ती शेरो-शायरी की श्रेणी में रख सकता है जो ट्रैक्टर की ट्रॉलियों से लेकर बड़े बड़े ट्रकों के आगे-पीछे अक्सर लिखी मिल जाती हैं या फिर चाट-पकौड़ी के ठेले अथवा किसी आशिक़ मिज़ाज नाई की दुकान के किसी कोने में लगी नेहा धूपिया टाइप हिरोइन के अर्धनग्न चित्र के साथ छपी हुई। लेकिन इन पंक्तियों को आप दोबारा पढ़िए आपको एहसास हो जाएगा कि ये वास्तव में कुछ अलग है। इसकी भाव-भूमि वह है जिस तक आजकल के हनी सिंह टाइप लौंडे तो नहीं ही पहुँच सकते।
खैर, हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आज के सोशल मीडिया के ज़माने की जहाँ हर कोई अपने आपको खुसरो, ज़ौक़, मीर, ग़ालिब और दुष्यंत कुमार समझता है। जहाँ कॉपी-पेस्ट की कला सीख लेना ही शायर हो जाने की गारण्टी है और जहाँ पहली पंक्ति का तुक दूसरी पंक्ति से मिल जाना ही शायरी मानी जाती है।
अभी कुछ ही दिन पहले की बात है हमारे एक फेसबुकिया मित्र की कालजयी पंक्तियाँ फ़ेसब…
Recent posts

दर्द की इन्तहा

दर्द की इन्तहा हुई फिर से । लो तेरी याद आ गयी फिर से ।। फिर कहाँ चढ़ रहा है रंग-ए-हिना । कहाँ बिजली सी गिर गयी फिर से ।। बंदिशें तोड़ के, ठुकरा के लौट आया है । दिल को ग़फ़लत सी हो गयी फिर से ।। वही ख़ुशबू जो बस गयी है मेरे सीने में । अश्क़ बनकर छलक उठी फिर से ।। 'पंकज'

ग़मों में मुस्कुराना

परिन्दे आँधियों में आशियाना ढूँढ़ लेते हैं !
बंजारे कहीं भी इक ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं !!
ग़मों की राह के हम भी मुसाफ़िर थे, मुसाफ़िर हैं,
ग़मों में भी मगर अब मुस्कुराना ढूँढ़ लेते हैं !!

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क सूत्र: +91-9651293983

लोग मिलते हैं सवालों की तरह

दोस्तों, बहुत लम्बा वक़्त गुज़र गया. अब सोचता हूँ तो लगता है  कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला.यह बात दीगर कि बीतते हुए को बिताना बड़ा मुश्किल है. 
खैर ये तो ज़िन्दगी की कश्मकश है जो चलती ही रहनी है. मलाल इस बात का है कि इस भागदौड़ में आपसे रूबरू होने का मौका न मिल पाया. हालाँकि इसमें मेरी लापरवाही भी एक वजह हो सकती है. कोशिश रहेगी कि आगे से ऐसा न होने पाए. ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे इस उम्मीद के साथ चन्द पंक्तियाँ आप की सेवा में ...


ख़्वाब जलते हैं चरागों की तरह ! लोग मिलते हैं सवालों की तरह!! रोशनी रोशनी में जलती है, धुन्ध रहती है हिजाबों की तरह!! वरक़ पलटूँ तो हर्फ़ कहते हैं, ज़िन्दगी यूँ कभी खिलती थी गुलाबों की तरह!!
बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'

अग़र ख़िलाफ़ है होने दो- राहत इंदौरी

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो जान थोड़ी है
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है
लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है
मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है
हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है
जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है
सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

रेत पर नाम-डॉ.विष्णु सक्सेना

रेत पर नाम लिखने से क्या फायदा,
एक आई लहर कुछ बचेगा नहीं।
तुमने पत्थर सा दिल हमको कह तो दिया,
पत्थरों पर लिखोगे मिटेगा नहीं।
मैं तो पतझर था फिर क्यूँ निमंत्रण दिया
ऋतु बसंती को तन पर लपेटे हुये,
आस मन में लिये प्यास तन में लिये
कब शरद आयी पल्लू समेटे हुये,
तुमने फेरीं निगाहें अँधेरा हुआ,
ऐसा लगता है सूरज उगेगा नहीं।
मैं तो होली मना लूँगा सच मानिए
तुम दिवाली बनोगी ये आभास दो,
मैं तुम्हें सौंप दूँगा तुम्हारी धरा
तुम मुझे मेरे पँखों का आकाश दो,
उँगलियों पर दुपट्टा लपेटो न तुम,
यूँ करोगे तो दिल चुप रहेगा नहीं।
आँख खोली तो तुम रुक्मिणी सी लगी
बन्द की आँख तो राधिका तुम लगीं,
जब भी सोचा तुम्हें शांत एकांत में
मीरा बाई सी एक साधिका तुम लगी,
कृष्ण की बाँसुरी पर भरोसा रखो,
मन कहीं भी रहे पर डिगेगा नहीं।

प्रेरक प्रसंग - पण्डित जी और नाविक

गंगा पार होनेके लिए कई लोग एक नौका में बैठे, धीरे-धीरे नौका सवारियों के साथ सामने वाले किनारे की ओर बढ़ रही थी। एक पंडित जी भी उसमें सवार थे पंडित जी ने नाविक से पूछा “क्या तुमने भूगोल पढ़ी है?” भोला-भाला नाविक बोला “भूगोल क्या है? इसका मुझे कुछ पता नहीं।” पंडितजी ने पंडिताई का प्रदर्शन करते हुए कहा, “तुम्हारी चौथाई जिंदगी पानी में गई।” फिर पंडित जी ने दूसरा प्रश्न किया, “क्या इतिहास जानते हो? महारानी लक्ष्मीबाई कब और कहाँ पैदा हुई तथा उन्होंने कैसे लड़ाई की ?” नाविक ने अपनी अनभिज्ञता जाहिर की तो पंडित जी ने विजयीमुद्रा में कहा “ ये भी नहीं जानते; तुम्हारी तो आधी जिंदगी पानी में गई।” फिर विद्या के मद में पंडित जी ने तीसरा प्रश्न पूछा “महाभारत का भीष्म-नाविक संवाद या रामायण का केवट और भगवान श्रीराम का संवाद जानते हो ?” अनपढ़ नाविक क्या कहे, उसने इशारे में ना कहा, तब पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले “तुम्हारी तो तींन चौथाई जिंदगी पानी में गई।”