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हिंदी महीने

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"मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन प्यासा" क्या कभी किशोर कुमार के गाये इस गाने को सुनकर आपके मन में इन महीनों के विषय में जिज्ञासा हुई है?
 यदि हाँ तो आइए जानते हैं इनके बारे में विस्तार से।

भारतीय पंचांग के अनुसार नव वर्ष का आरंभ अंग्रेजी माह मार्च-अप्रैल के बीच चैत्र नामक मास से होता है। इस महीने का नाम चैत्र इसलिए रखा गया क्योंकि इस माह की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होता है। चित्रा से हुआ चैत्र। इसी प्रकार विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ। 
अर्थात् जिस माह की पूर्णमासी को चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस माह का नाम उसी नक्षत्र के आधार पर होता है।
इस तरह कुल 12 हिंदी महीने होते हैं।
प्रत्येक महीने में 15-15 दिनों के दो पक्ष होते हैं-
शुक्ल पक्ष कृष्ण पक्ष।

देखें पूरी सूची-

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ-गोपालदास 'नीरज'

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो!
हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते,
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते,
सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं,
मेरे पग तब चलने में भी शरमाते,
मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे,
तुम पथ के कण कण को तूफान करो।

चंद अशआर

1-खुद जल के ज़माने को जो रोशन करते हैं
अपने अरमानों के सर अपने हाथों कलम करते हैं
कब रूह भी अपनी बेखबर बिक जाए
इसलिए अपने कंधे पर कफन रखते हैं
न दौलत के जाम हैं न जमीं के सौदे
इस जहाँ को कठपुतलियों का चमन कहते हैं
अफ़सोस ये दरिन्दे उन परिंदों के पर को भी नहीं बख्शते
जो दिलों में बस पैगाम-ए-वफ़ा ले के उड़ते हैं

युग-परिवर्तन

अभिजीत'मानस' यह कैसा नवयुग है आया
कैसा परिवेश उपस्थित है
जैसे रावण की नगरी में
राम की सीता स्थित है

लघुकथा-एक भूख तीन प्रतिक्रियाएँ

डॉ. हेमंत कुमार शहर का एक प्रमुख पार्क।पार्क के बाहर गेट पर बैठा हुआ एक
अत्यन्त बूढ़ा भिखारी।बूढ़े की हालत बहुत दयनीय थी।
पतला दुबला, फ़टे चीथड़ों में लिपटा हुआ।पिछले चार दिनों से
उसके पेट में सिर्फ़ दो सूखी ब्रेड का टुकड़ा और एक कप चाय
जा पायी थी।बूढ़ा सड़क पर जाने वाले हर व्यक्ति का ध्यान
आकर्षित करने के लिये हाँक लगाता....“खुदा के नाम पर—एक
पैसा इस गरीब को—भगवान भला करेगा”।सुबह से उसे अब तक
मात्र दो रूपया मिल पाया था,जो कि शाम को पार्क
का चौकीदार किराये के रूप में ले लेगा।
अचानक पार्क के सामने एक रिक्शा रुका।उसमें से बॉब
कट बालों वाली जीन्स टॉप से सजी एक युवती उतरी।

गज़ल-उस शाम वो रुखसत का समाँ

इब्ने-इंशा उस शाम वो रुखसत का समाँ याद रहेगा।
वो शहर, वो कूचा, वो मकाँ  याद रहेगा।।
वो टीस कि उभरी थी इधर  याद रहेगा,
वो दर्द  कि उट्ठा था उधर याद रहेगा।
हाँ बज़्मे-शबाना में हमाशौक़ जो उस दिन,
हम थे तेरी जानिब निगराँ  याद रहेगा।
कुछ 'मीर' के अबियात थे कुछ फ़ैज़ के मिसरे,
इक दर्द का था जिनमें बयाँ,  याद रहेगा।
हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे,
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा।

मायने-
बज़्मे-शबाना = रात की महफ़िल
हमाशौक़ = शौक़ के साथ
निगराँ = दर्शक
अबियात = शे'र 
मिसरे = कविता की पंक्तियाँ

घाघ की कहावतें

घाघ भारत के लोक-कवि हैं जिनकी कहावतें आज भी किसानों के बीच खूब लोकप्रिय हैं। आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ लोकप्रिय  कहावतें-

प्रातकाल खटिया ते उठि कै पियै तुरतै पानी।
कबहूँ घर मा बैद न अइहैं बात घाघ कै जानी।।


रहै निरोगी जो कम खाय।
बिगरै न काम जो गम खाय।।


सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।


शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
कहैं घाघ सुन घाघनी, बिन बरसे ना जाय।।

हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी-'उसने कहा था'

चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी'
बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से
जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे
हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट
वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े
शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते
हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध
स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने
वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के
न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के
पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और
संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक
की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग
चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र
का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज',
ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद
फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के
जंगल से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि जी और साहब
बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात
नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर
मीठी छुरी की तरह म…

जो बीत गई-हरिवंश राय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई ! जीवन में एक सितारा था, माना, वह बेहद प्यारा था, वह डूब गया तो डूब गया; अंबर के आनन को देखो, कितने इसके तारे टूटे, कितने इसके प्यारे छूटे, जो छूट गए फिर कहाँ मिले; पर बोलो टूटे तारों पर कब अंबर शोक मनाता है ! जो बीत गई सो बात गई !