चंद अशआर

1-खुद जल के ज़माने को जो रोशन करते हैं
अपने अरमानों के सर अपने हाथों कलम करते हैं
कब रूह भी अपनी बेखबर बिक जाए
इसलिए अपने कंधे पर कफन रखते हैं
न दौलत के जाम हैं न जमीं के सौदे
इस जहाँ को कठपुतलियों का चमन कहते हैं
अफ़सोस ये दरिन्दे उन परिंदों के पर को भी नहीं बख्शते
जो दिलों में बस पैगाम-ए-वफ़ा ले के उड़ते हैं


2-कहते हो खुदा बस प्यार सिखाता है
और करते हो नफरत खुदा के बन्दों से
कभी मंदिर की चोटी कभी मस्जिद का गुम्बद
मोहब्बत करना सीखो इन बेजुबां परिंदों से

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