युग-परिवर्तन

अभिजीत'मानस'

यह कैसा नवयुग है आया
कैसा परिवेश उपस्थित है
जैसे रावण की नगरी में
राम की सीता स्थित है


बस उपभोगों की वस्तु है नारी
दृष्टि में बस अबला है
क्या वीर भरत का यही है भारत..?
जो इतना सब कुछ बदला है

अब है कहाँ लखन सा भाई
जो राम सिया संग वन जाये
कहाँ है रघुवर सा सामंजस्य
जो जाति भीलनी फल खाए

प्रेमादर्शों में परिवर्तन
कथनी-करनी में अंतर आए
बस स्वार्थ बचा है प्रेम शब्द में
अब कौन साग विदुर घर खाए

वो होली के राग वसंती
क्या दीवाली के उत्सव थे
प्रकृति स्वयं गाती थी कजली
पुरंदर कृपा महोत्सव में

वो मेरा भारत कहाँ गया
जब पत्थर पूजे जाते थे
सुन्दर मधुर विहग कलरव संग
लता वृक्ष भी गाते थे

सरिता अविरल निर्मल बहती
नीर सुगंध सुधा सम था
राग ललित लालित्य मनोहर
घर आँगन बसती ललित कला

यह जीवन अब नीरस लगता
बस अभिलषित रहा उन हिस्सों को
स्वयं तरसते देव वृन्द जिन
दादी नानी के किस्सों को


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