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Showing posts from 2017

वायु प्रदूषण और पीएम 2.5 | PM2.5

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वायु प्रदूषण और पीएम 2.5  ऐसे शब्द हैं जो इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। आइये हम वायु प्रदूषण के ही सन्दर्भ में पीएम 2.5 के बारे में जानते हैं। 
वायुमण्डल हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण भाग है। वायुमण्डल से ही हम अपने जीवन के लिए अनिवार्य प्राणवायु ग्रहण करते हैं जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में ऑक्सीजन (O2) के नाम से जाना जाता है। यह प्राणवायु हमारे लिए कितनी आवश्यक है इस बात का अनुमान ऐसे कर सकते हैं कि-
"बिना भोजन के हम २० दिनों तक जीवित रह सकते हैं। बिना जल के ७ दिनों तक जीवित रहा जा सकता है। किन्तु प्राणवायु के अभाव में मनुष्य ७ मिनट भी जीवित नहीं रह सकता।"
यही प्राणदायिनी वायु आज इतनी विषैली होती जा रही है कि हमारे प्राणों के लिए ही घातक बन गयी है।
इन दिनों ये ख़बरें लगातार सुर्ख़ियों में हैं कि भारत के अमुक राज्य में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। चारों तरफ स्मॉग फैला हुआ है। पूरा परिक्षेत्र गैस चैम्बर में तब्दील हो गया है। स्कूल, कॉलेज तक बंद करने की नौबत आ गयी है। इस दौरान वायु में पीएम2.5 की मात्रा मानक से १० गुना तक ज्याद…

जिसने पाप न किया हो

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बात बहुत पुरानी है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही न्यायप्रिय था। उसके राज्य में अपराधियों के लिए कड़े दण्ड का प्रावधान था। चोरों को फाँसी पर लटका दिया जाता था।

एक बार एक चोर को चोरी करते हुए पकड़ा गया। अपराध सिद्ध होने पर राजा ने चोर को नियमानुसार फाँसी की सजा सुनाई। चोर सजा भुगतने के लिए सहर्ष तैयार हो गया लेकिन उससे पहले उसने राजा से कहा हुजूर मैं एक गुप्त विद्या जानता हूँ जो मैं मारने से पहले आपको सिखाकर जाना चाहता हूँ। ताकि यह विद्या मेरे मरने साथ खत्म न हो जाय। महाराज मैं सोने की खेती करना जानता हूँ।

राजा ने चोर को अपने पास बुलवाया और पूछा- सोने की खेती कैसे की जाती है? बताओ! चोर बोला- महाराज! सवा किलो सोने के, मटर के बराबर दाने सुनार से बनवाकर मँगा दीजिए। मैं राजमहल की चहारदीवारी में ही क्यारी बनाकर उन्हें बोउँगा। जब तक सोने के दाने आएँगे, तब तक मैं क्यारियाँ तैयार कर लूँगा। राजा ने चोर की बात मान ली और सोने के बीज तैयार करने का आदेश दे दिया। इधर चोर ने फावड़ा लिया, फावड़े से मिट्टी खोदी। फिर खुरपी और हाथों की सहायता से मिट्टी तैयार की। तब तक सोने के दाने भी आ गए।

प्रेम की उत्कृष्ट कविता | Love poem - रात आधी खींच कर मेरी हथेली

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"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती" का सुंदर संदेश देने वाले प्रख्यात कवि और लेखक 'हरिवंश राय बच्चन' का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनकी लोकप्रिय कृति 'मधुशाला' की पंक्तियाँ हर साहित्य प्रेमी की जुबान पर होती हैं। सूफी दर्शन से ओतप्रोत 'मधुशाला' एक ऐसी अनुपम कृति है जिसकी प्रसिद्धि के आयाम को २०वीं सदी के बाद की कोई दूसरी रचना अब तक नहीं प्राप्त कर पायी है।
मधुशाला के अलावा भी भी उनकी अन्य रचनाएँ जैसे मधुकलश, निशा निमंत्रण, धार के इधर उधर, मिलन यामिनी, आकुल अंतर, प्रणय पत्रिका इत्यादि सब एक से बढ़कर एक हैं और सभी रचनाएँ भाव और शिल्प दोनों ही दृष्टिकोण से श्रेष्ठ हैं
लेकिन दोस्तों, आज हम यहाँ बात कर रहे हैं उनकी एक ऐसी कविता की जो शायद हिंदी साहित्य में लिखे गए सर्वश्रेष्ट प्रेम गीतों में स्थान पाने की योग्यता रखती है। प्रेम और वेदना की जिस भाव-भूमि पर उतर कर कवि ने इस कविता को रचा है वह किसी भी सहृदय के के मन के तारों को झंकृत कर देने के लिए काफी है।सोने पे सुहागा यह कि इसका शिल्प-विधान और शब्द चयन भी उनकी अन्य रचनाओं की तरह ही उत्कृष्ट है। यह बात …

हिंदी भाषा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानंद का एक प्रेरक प्रसंग

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स्वामी विवेकानंद विश्वविख्यात धर्माचार्य और विद्वान थे। उन्हें हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं का ज्ञान था। वास्तव में जिस संत ने अपने संबोधन से अमेरिका वासियों को मंत्रमुग्ध कर दिया हो उसके अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के विषय में भला किसे संदेह हो सकता है। किन्तु उन्हें अपनी संस्कृति के साथ-साथ अपनी मातृभाषा से भी गहरा प्रेम था। वे अपनी संस्कृति से जुड़ी समस्त वस्तुओं में मातृभाव रखते थे और उनका सम्मान करते थे। हिंदी भाषा के प्रति भी उनके मन में यही भाव था। वे हिंदी को 'माँ' के समान मानते थे।  उनसे जुड़ा यह प्रसंग बहुत रोचक और प्रेरणादायी है। स्वामी विवेकानंद एक बार विदेश गए। वहाँ उनके अनेक प्रशंसक उनसे मिलने के लिए आये हुए। थे उन लोगों ने स्वामी जी की तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया और अपनी सभ्यता के अनुसार अंग्रेजी में 'हेलो' (Hello)कहा जिसके जवाब में स्वामी जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा- 'नमस्ते'। उन लोगों ने सोचा शायद स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती है।  तब उनमें से एक ने हिंदी में पूछा "आप कैसे हैं"? स्वामी जी ने सहज भाव से उत्तर दिया  &qu…

मेरा नया बचपन / mera naya bachpan

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बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥


चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद॥


ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥


किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचा कर सूना घर आबाद किया॥


रोना और मचल जाना भी क्या आनन्द दिलाते थे।

बड़े-बड़े मोती से आँसू जयमाला पहनाते थे॥


मैं रोई माँ काम छोड़कर, आई मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम गीले गालों को सुखा दिया॥


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥


वह सुख का साम्राज्य छोड़ कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई  ॥


लाज भरी आँखें थी मेरी, मन में उमंग रंगीली थी।

तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥


दिल में एक चुभन-सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।

मन में एक पहेली थी मैं सबके बीच अकेली थी॥


मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।

अरे जवानी के फँदे  में  मुझको  फँसा  दिया तूने॥


सब गलियाँ उसकी भ…

हे री मैं तो प्रेम दिवानी

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हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।
घायल की गति घायल जाणै जो कोई घायल होय।
जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय। 
सूली ऊपर सेज हमारी सोवण किस बिध होय।


गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।


दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।


मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय।


                                                      -मीराबाई

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

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पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

वस्तु अमोलिक दी म्हारे सतगुरु
किरपा कर अपनायो ।।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

जनम जनम की पूँजी पाई ।
जग में सभी खोआयो ।।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

खरचे न खूटे वाको चोर न लूटे ।
दिन दिन बढ़त सवायो ।।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

सत की नाव खेवटिया सतगुरु ।
भवसागर तर आयो ।।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ।
हरष हरष जस गायो ।।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।।

प्यार को दोस्ती बताता हूँ

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प्यार को दोस्ती बताता हूँ। झूठ यूँ दिल से बोल जाता हूँ।।
जब भी सोचूँ उसे तन्हाई में। बाख़ुदा खुद को भूल जाता हूँ।।
उसकी बातें जो याद आती हैं। मैं अकेले में मुस्कुराता हूँ।।
कभी हारूँ नहीं मैं दिल अपना। हाँ मगर दिल से हार जाता हूँ।।
आँच आये न उसके दामन पर। अपनी ही लौ में सुलग जाता हूँ।।
बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज' मो०-९६५१२९३९८३

जब तुम्हारा दुपट्टा सरकता था

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"तूने मेरी मोहब्बत की गहराइयों को समझा ही नहीं सनम..! तेरे बदन से जब दुपट्टा सरकता था हम नज़रें झुका लेते थे..!!"
   ऐसे ही कहीं कुछ पढ़ रहा था और नज़र पड़ गयी इन पंक्तियों पर। 
प्रथमदृष्टया कोई भी इसे उस सस्ती शेरो-शायरी की श्रेणी में रख सकता है जो ट्रैक्टर की ट्रॉलियों से लेकर बड़े बड़े ट्रकों के आगे-पीछे अक्सर लिखी मिल जाती हैं या फिर चाट-पकौड़ी के ठेले अथवा किसी आशिक़ मिज़ाज नाई की दुकान के किसी कोने में लगी नेहा धूपिया टाइप हिरोइन के अर्धनग्न चित्र के साथ छपी हुई। लेकिन इन पंक्तियों को आप दोबारा पढ़िए आपको एहसास हो जाएगा कि ये वास्तव में इन सबसे कुछ अलग हैं। इसकी भाव-भूमि वह है जिस तक आजकल के हनी सिंह टाइप लौंडे तो नहीं ही पहुँच सकते। खैर, हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आज के सोशल मीडिया के ज़माने की जहाँ हर कोई अपने आपको खुसरो, ज़ौक़, मीर, ग़ालिब और दुष्यंत कुमार समझता है। जहाँ कॉपी-पेस्ट की कला सीख लेना ही शायर हो जाने की गारण्टी है और जहाँ पहली पंक्ति का तुक दूसरी पंक्ति से मिल जाना ही शायरी मानी जाती है। अभी कुछ ही दिन पहले की बात है हमारे एक फेसबुकिया मित्र की कालजयी पंक्तियाँ …

दर्द की इन्तहा

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दर्द की इन्तहा हुई फिर से।
लो तेरी याद आ गयी फिर से।।

फिर कहाँ चढ़ रहा है रंग-ए-हिना, कहाँ बिजली सी गिर गयी फिर से।।

बंदिशें तोड़ के, ठुकरा के लौट आया है, दिल को ग़फ़लत सी हो गयी फिर से।।

वही ख़ुशबू जो बस गयी है मेरे सीने में, अश्क़ बनकर छलक उठी फिर से।।
बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क-९६५१२९३९८३

ग़मों में मुस्कुराना

परिन्दे आँधियों में आशियाना ढूँढ़ लेते हैं !
बंजारे कहीं भी इक ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं !!
ग़मों की राह के हम भी मुसाफ़िर थे, मुसाफ़िर हैं,
ग़मों में भी मगर अब मुस्कुराना ढूँढ़ लेते हैं !!

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क सूत्र: +91-9651293983

लोग मिलते हैं सवालों की तरह

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दोस्तों, बहुत लम्बा वक़्त गुज़र गया। अब सोचता हूँ तो लगता है कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला। यह बात दीगर कि अभी जो बीत रहा है उसको बिता पाना बड़ा मुश्किल है।

ख़ैर ये तो ज़िन्दगी की कश्मकश है जो चलती ही रहनी है। मलाल इस बात का है कि इस भागदौड़ में आपसे रूबरू होने का मौका न मिल पाया। हालाँकि इसमें मेरी लापरवाही भी एक वजह हो सकती है। कोशिश रहेगी कि आगे से ऐसा न होने पाए और ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे। इस उम्मीद के साथ चन्द पंक्तियाँ आप की सेवा में ...


ख़्वाब जलते हैं चरागों की तरह ! लोग मिलते हैं सवालों की तरह !! रोशनी रोशनी में जलती है, धुन्ध रहती है हिजाबों की तरह !! वरक़ पलटूँ तो हर्फ़ कहते हैं, ज़िन्दगी भी कभी खिलती थी गुलाबों की तरह !!
बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
मो0-9651293983