लोग मिलते हैं सवालों की तरह

दोस्तों, बहुत लम्बा वक़्त गुज़र गया. अब सोचता हूँ तो लगता है  कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला.यह बात दीगर कि बीतते हुए को बिताना बड़ा मुश्किल है. 
खैर ये तो ज़िन्दगी की कश्मकश है जो चलती ही रहनी है. मलाल इस बात का है कि इस भागदौड़ में आपसे रूबरू होने का मौका न मिल पाया. हालाँकि इसमें मेरी लापरवाही भी एक वजह हो सकती है. कोशिश रहेगी कि आगे से ऐसा न होने पाए. ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे इस उम्मीद के साथ चन्द पंक्तियाँ आप की सेवा में ...


ख़्वाब जलते हैं चरागों की तरह !
लोग मिलते हैं सवालों की तरह!!
रोशनी रोशनी में जलती है,
धुन्ध रहती है हिजाबों की तरह!!
वरक़ पलटूँ तो हर्फ़ कहते हैं,
ज़िन्दगी यूँ कभी खिलती थी गुलाबों की तरह!!

बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'

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