मैं नीर भरी दुख की बदली - महादेवी वर्मा


   वेदना और मर्म की कवयित्री महादेवी जी का छायावादी कवियों में प्रमुख स्थान है। छायावाद चतुष्टयी में प्रसाद, पन्त और निराला के बाद उन्हीं का नाम आता है। उनके काव्य में उस अज्ञात प्रियतम के लिए तड़प और उससे दूर होने की पीड़ा सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। यह दर्द, यह पीड़ा कवयित्री के मन में इस तरह रच-बस गई है कि उसे सम्पूर्ण सृष्टि इसी पीड़ा में ही सिमटी हुई लगती है। वह तड़पकर कह उठती है- "तुझको पीड़ा में ढूँढा, तुझमें ढूँढूँगी पीड़ा"। अनुभूतियों के इसी उत्कर्ष ने उन्हें रहस्यवाद की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री बना दिया।        

 आइए पढ़ते हैं उनकी कविता- मैं नीर भरी दुःख की बदली




मैं नीर भरी दुख की बदली!

स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!

मेरा पग पग संगीत भरा,
श्वासों में स्वप्न पराग झरा,
नभ के नव रँग बुनते दुकूल,
छाया में मलय बयार पली!


मैं क्षितिज भृकुटि पर घिर धूमिल,
चिंता का भार बनी अविरल,
रज-कण पर जल-कण हो बरसी,
नव जीवन-अंकुर बन निकली!

पथ न मलिन करता आना,
पद चिह्न न दे जाता जाना,
सुधि मेरे आगम की जग में,
सुख की सिहरन हो अंत खिली!

विस्तृत नभ का कोई कोना,
मेरा न कभी अपना होना,
परिचय इतना इतिहास यही,
उमड़ी कल थी मिट आज चली!

मैं नीर भरी दुख की बदली !

बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु! - सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!

यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों पाँव बंधु!


वह हँसी बहुत कुछ कहती थी,
फिर भी अपने में रहती थी,
सबकी सुनती थी, सहती थी,
देती थी सबके दाँव, बंधु!

बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!



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मनुष्यता - राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखंड आत्म भाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

लघुकथा - जवाहर चौधरी



रोज अंधेरा होते ही एक उल्लू  मंदिर के गुंबद पर बैठ जाता। परेशान  लोग अपशगुन मान कर उसे उड़ाते लेकिन वह हठी, उड़ जाता पर कुछ देर बाद वापस लौट आता। एक बार देर रात उसे मौका मिल गया। जगदीश्वर  खुली हवा में टहल रहे थे, वह उनके सामने आया, --‘‘ मेरी समस्या का समाधान कीजिए जगदीश्वर।’’‘‘ पूछो लक्ष्मीवाहक, क्या बात है ?’’‘‘ जगदीश्वर, मेरे पुरखे आस्ट्रेलिया  के थे इसलिए वे आस्ट्रेलियन  कहलाए। मेरे कुछ बंधु जर्मनी में हैं वे जर्मन कहलाते हैं। अमेरिका में रहने वाले मेरे भाई अमेरिकन हैं। तो में हिन्दुस्तान में रहने वाला हिन्दू क्यों नहीं हूं !?’’जगदीश्वर मुस्कराए, बोले -‘‘ तुम हिन्दुस्तान में हो इसलिए बेशक हिन्दुस्तानी हो। लेकिन हिन्दू नहीं उल्लू हो। .....  हिन्दुस्तानी उल्लू ।’’

किसी पे दिल अगर आ जाए


किसी पे दिल अगर आ जाए तो क्या होता हें ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है!!
कोई दिल पे अगर छा जाए तो क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है!!
मुझ को जुल्फ़ों के साए में सो जाने दो सनम,
हो रहा है जो दिल मे हो जाने दो सनम,
बात दिल की दिल में रह जाए, तो फ़िर क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है!!
क्या मंज़ूर है ख़ुदा को बताओ तो ज़रा,
जान जाओगी बाहों में आ जाओ तो ज़रा,
कोई जो बाहों में आ जाए तो फ़िर क्या होता है ?
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है!!
"गुलशन बावरा"

हिंदी की दुर्दशा - काका 'हाथरसी'

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य
सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य
है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा-
बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा
कहँ ‘ काका ‘ , जो ऐश कर रहे रजधानी में
नहीं डूब सकते क्या चुल्लू भर पानी में
पुत्र छदम्मीलाल से, बोले श्री मनहूस
हिंदी पढ़नी होये तो, जाओ बेटे रूस
जाओ बेटे रूस, भली आई आज़ादी
इंग्लिश रानी हुई हिंद में, हिंदी बाँदी
कहँ ‘ काका ‘ कविराय, ध्येय को भेजो लानत
अवसरवादी बनो, स्वार्थ की करो वक़ालत

डॉ. राजेश कुमार मिश्र का आलेख - भाषा शिक्षण : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ



र्तमान समय में तेजी से प्रगति कर रहे शैक्षिक परिवेश में भाषा शिक्षण का क्षेत्र भी अत्यंत चुनौतियों से भर चुका है। आज के शैक्षिक वातावरण में अध्ययनरत विद्यार्थियों को परम्परागत तरीके की शिक्षण प्रणाली न केवल उनको नीरसता की ओर ले जाती है बल्कि निष्क्रियता की ओर भी ढकेल देती है। आज का विद्यार्थी २१वीं सदी का शिक्षार्थी है जो शैक्षिक विषयों को भी अपने लक्ष्य प्राप्त करने का साधन मानकर चलता है। अगर उसे लगता है कि कोई विषय उसके लक्ष्य साधन के लिए आवश्यक अंग नहीं है तो वह उसकी ओर या तो बहुत ही कम ध्यानाकृष्ट करता है या फिर अनिवार्य होने की दशा में अत्यंत नीरस भाव से एक सीमा तक उसका भार सहन करने की कोशिश में लग जाता है। ऐसी परिस्थितियों में इन विद्यार्थियों को परम्परागत शिक्षण पद्धति द्वारा शिक्षित करने का उद्देश्य शिक्षक के लिए अत्यंत कठिन एवं दुरूह हो जाता है।

हरिशंकर परसाई का व्यंग्य-अश्लील



अश्लील 
हरिशंकर परसाई 


  शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।

दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हर एक के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

कोई दीवाना कहता है-डॉ. कुमार विश्वास

आधुनिक हिंदी काव्य में लोकप्रिय कवि एवं राजनेता कुमार विश्वास का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं।आइए आज पढ़ते हैं उनकी बहुचर्चित रचना "कोई दीवाना कहता है"-

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है
मगर धरती की बेचैनी को, बस बादल समझता है
मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है
ये तेरा दिल समझता है, या मेरा दिल समझता है
मोहब्बत एक एहसासों की, पावन सी कहानी है
कभी कबीरा दीवाना था, कभी मीरा दीवानी है
यहाँ सब लोग कहते है, मेरी आँखों में आंसू है
जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है

हिंदी महीने और उनके नाम Name of Hindi months

  "मेरे नैना सावन भादों फिर भी मेरा मन प्यासा" क्या कभी किशोर कुमार के गाये इस गाने को सुनकर आपके मन में इन महीनों के विषय में जिज्ञासा हुई है? 

 यदि हाँ तो आइए जानते हैं इनके बारे में विस्तार से।


भारतीय पंचांग के अनुसार नव वर्ष का आरंभ अंग्रेजी माह मार्च-अप्रैल के बीच चैत्र नामक मास से होता है। इस महीने का नाम चैत्र इसलिए रखा गया क्योंकि इस माह की पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा चित्रा नक्षत्र में होता है। चित्रा से हुआ चैत्र। इसी प्रकार विशाखा से वैशाख, ज्येष्ठा से ज्येष्ठ। 

अर्थात् जिस माह की पूर्णमासी को चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है उस माह का नाम उसी नक्षत्र के आधार पर होता है।

इस तरह कुल 12 हिंदी महीने होते हैं।

प्रत्येक महीने में 15-15 दिनों के दो पक्ष होते हैं-

  • शुक्ल पक्ष 
  • कृष्ण पक्ष।


देखें पूरी सूची-

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ-गोपालदास 'नीरज'

मैं तूफानों में चलने का आदी हूँ
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो!
हैं फूल रोकते, काँटे मुझे चलाते,
मरुस्थल, पहाड़ चलने की चाह बढ़ाते,
सच कहता हूँ मुश्किलें न जब होती हैं,
मेरे पग तब चलने में भी शरमाते,
मेरे संग चलने लगें हवाएँ जिससे,
तुम पथ के कण कण को तूफान करो।

चंद अशआर



1-लगी है शर्त मेरी आज फिर ज़माने से।
   रोक सकता है मुझे कौन मुस्कुराने से।।


2-कभी दिन में तो कभी रात में आ जाता है।
कभी ख़्वाहिश कभी जज़्बात में आ जाता है।।
लाख समझाऊँ, करूँ कोशिशें भुलाने की।
नाम उसका मेरी हर बात में आ जाता है।।

युग-परिवर्तन

अभिजीत'मानस'

यह कैसा नवयुग है आया
कैसा परिवेश उपस्थित है
जैसे रावण की नगरी में
राम की सीता स्थित है

लघुकथा-एक भूख तीन प्रतिक्रियाएँ

डॉ. हेमंत कुमार

शहर का एक प्रमुख पार्क।पार्क के बाहर गेट पर बैठा हुआ एक
अत्यन्त बूढ़ा भिखारी।बूढ़े की हालत बहुत दयनीय थी।
पतला दुबला, फ़टे चीथड़ों में लिपटा हुआ।पिछले चार दिनों से
उसके पेट में सिर्फ़ दो सूखी ब्रेड का टुकड़ा और एक कप चाय
जा पायी थी।बूढ़ा सड़क पर जाने वाले हर व्यक्ति का ध्यान
आकर्षित करने के लिये हाँक लगाता....“खुदा के नाम पर—एक
पैसा इस गरीब को—भगवान भला करेगा”।सुबह से उसे अब तक
मात्र दो रूपया मिल पाया था,जो कि शाम को पार्क
का चौकीदार किराये के रूप में ले लेगा।
अचानक पार्क के सामने एक रिक्शा रुका।उसमें से बॉब
कट बालों वाली जीन्स टॉप से सजी एक युवती उतरी।

गज़ल-उस शाम वो रुखसत का समाँ

              इब्ने-इंशा

उस शाम वो रुखसत का समाँ याद रहेगा।
वो शहर, वो कूचा, वो मकाँ  याद रहेगा।।
वो टीस कि उभरी थी इधर  याद रहेगा,
वो दर्द  कि उट्ठा था उधर याद रहेगा।
हाँ बज़्मे-शबाना में हमाशौक़ जो उस दिन,
हम थे तेरी जानिब निगराँ  याद रहेगा।
कुछ 'मीर' के अबियात थे कुछ फ़ैज़ के मिसरे,
इक दर्द का था जिनमें बयाँ,  याद रहेगा।
हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे,
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा।

मायने-
बज़्मे-शबाना = रात की महफ़िल
हमाशौक़ = शौक़ के साथ
निगराँ = दर्शक
अबियात = शे'र 
मिसरे = कविता की पंक्तियाँ

घाघ की कहावतें

घाघ भारत के लोक-कवि हैं जिनकी कहावतें आज भी किसानों के बीच खूब लोकप्रिय हैं। आइए पढ़ते हैं उनकी कुछ लोकप्रिय  कहावतें-



प्रातकाल खटिया ते उठि कै पियै तुरतै पानी।
कबहूँ घर मा बैद न अइहैं बात घाघ कै जानी।।


रहै निरोगी जो कम खाय।
बिगरै न काम जो गम खाय।।


सावन सुक्ला सप्तमी, जो गरजै अधिरात।
बरसै तो झूरा परै, नाहीं समौ सुकाल।।


शुक्रवार की बादरी, रही सनीचर छाय।
कहैं घाघ सुन घाघनी, बिन बरसे ना जाय।।

हिंदी की सर्वश्रेष्ठ प्रेम कहानी-'उसने कहा था' Best love story in HindI

उसने कहा था  Best love story in hindi


बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से
जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे
हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट
वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े
शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते
हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध
स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने
वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के
न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के
पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और
संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक
की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग
चक्करदार गलियों मे हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र
का समुद्र उमड़ा कर-- बचो खालसाजी, हटो भाईज',
ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद
फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के
जंगल से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि जी और साहब
बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात
नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर
मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई
बुढ़िया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से
नही हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं-- हट जा जीणे
जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए. बच
जा लम्बी वालिए।

जो बीत गई सो बात गई-हरिवंश राय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई !
जीवन में एक सितारा था,
माना, वह बेहद प्यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अंबर के आनन को देखो,
कितने इसके तारे टूटे,
कितने इसके प्यारे छूटे,
जो छूट गए फिर कहाँ मिले;
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है !
जो बीत गई सो बात गई !

पुष्प की अभिलाषा-चाह नहीं मैं सुरबाला के

चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूँथा जाऊँ।
चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ।।
चाह नहीं सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊँ।
चाह नहीं देवों के सिर पर चढ़ूँ, भाग्य पर इतराऊँ।।
मुझे तोड़ लेना बनमाली! उस पथ पर देना तुम फेंक।
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने जिस पथ जावें वीर अनेक।।

                                               'माखनलाल चतुर्वेदी'

ग़ज़ल-ख़ुमार बाराबंकवी

एक पल में एक सदी का मज़ा हमसे पूछिए,
दो दिन की ज़िन्दगी का मज़ा हमसे पूछिए।
भूले हैं रफ़्ता-रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम,
किश्तों में ख़ुदकुशी का मज़ा हमसे पूछिए।
आगाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए,
अंजाम-ए-आशिक़ी का मजा हमसे पूछिए।
जलते दियों में जलते घरों जैसी लौ कहाँ,
सरकार-ए-रोशनी का मज़ा हमसे पूछिए।
वो जान ही गए कि हमें उनसे प्यार है,
आँखों की मुखबिरी का मज़ा हमसे पूछिए।
हँसने का शौक हमको भी था आपकी तरह,
हँसिए मगर हँसी का मज़ा हमसे पूछिए।
                                               'ख़ुमार बाराबंकवी'

हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान || Hindi Hindu Hindustan

    हिन्दी हिंदुस्तान की सर्वप्रमुख भाषा है किंतु यह आश्चर्यजनक तथ्य है कि 'हिंदी' शब्द की व्युत्पत्ति में भारतीय नहीं अपितु वैदेशिक कारक उत्तरदायी हैं। 'सिन्धु' शब्द का भारतवर्ष से गहरा सम्बन्ध है। भारत की पहचान में सिन्धु का भी अपना स्थान रहा है। जब ईरान के लोग भारत आए तो उन्होंने सिन्धु को हिन्दु कहना आरंभ कर दिया क्योंकि फ़ारसी में 'स' वर्ण का उच्चारण 'ह' के रूप में किया जाता है।इस प्रकार सिन्धु परिवर्तित होकर हिंदु और सिन्धु प्रदेश के निवासी हिंदु या हिन्दू हो गए।हिन्दू का अर्थ हुआ हिन्द का रहने वाला और हिंदी का मतलब हिन्द का। स्पष्टतः इनकी भाषा भी हिन्दवी या हिंदी बोली जाने लगी। समय के साथ आर्यावर्त और भारतवर्ष के साथ हिंदुस्तान शब्द का भी प्रयोग होने लगा। "हिंदी, हिंदू, हिंदुस्तान" के मूल में यही तथ्य विद्यमान है।


     हिंदी भाषा का जन्म कब हुआ इस संबंध में यद्यपि कोई एक तिथि निर्धारित कर पाना मुश्किल है तथापि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि हिंदी भाषा का प्रयोग सातवीं शताब्दी के आसपास ही आरंभ हो गया था।

    माना जाता है कि हिंदी का सर्वप्रथम प्रयोग अमीर खुसरो ने किया। उन्होंने गयासुद्दीन तुगलक के बेटे को भाषा (हिंदी) सिखाने के लिए 'ख़ालिकबारी' नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें 'हिन्दवी' शब्द 30 बार और 'हिंदी' शब्द 5 बार आया है। चूँकि खुसरो का समय तेरहवीं सदी माना जाता है इसलिए 'हिंदी' शब्द का पहला प्रयोग भी तेरहवीं सदी में हुआ। परंतु 'हिंदी' शब्द का प्रयोग होने से पहले ही उस भाषा का प्रयोग आरंभ हो चुका था जिसमें आधुनिक हिंदी के लक्षण विद्यमान थे। 'सरहपा' या 'सरहपाद' को हिंदी का पहला कवि माना जाता है जिनका समय सातवीं शताब्दी है। कतिपय विद्वान 'पुष्य' या 'पुण्ड' नामक कवि को हिंदी का पहला कवि मानते हैं। इनका भी समय सातवीं शताब्दी का है। अतः निर्विवाद रूपेण हिंदी भाषा का प्रादुर्भाव सातवीं शताब्दी का जानना चाहिए।

     हिंदी भाषा 7वीं सदी से आरंभ होकर आज 21वीं सदी में उत्तरोत्तर प्रगति को प्राप्त होती हुई विश्व में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है।दुनिया के सैकड़ों देशों में हिंदी का प्रयोग हो रहा है। इसकी 'देवनागरी' लिपि को विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें भारतेंदु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, मुंशी प्रेमचंद, महात्मा गाँधी, डॉ० हरिवंशराय बच्चन और अनेकानेक युग पुरोधाओं ने अपना अमूल्य योगदान दिया है। भारत आज विश्व मंच पर दमदारी के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है। ऐसे में हिंदी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यह हमारा पुनीत कर्तव्य है कि हिंदी का यथासंभव अधिकाधिक प्रयोग करें, इसका सम्मान करें और इसे सच्चे अर्थों में 'राष्ट्रभाषा' बनाने में अपना सहयोग प्रदान करें।

अंततः राष्ट्र के विकास में मातृभाषा के उत्थान के महत्व को रेखांकित करतीं निम्न पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-

निज भाषा उन्नति अहै,सब उन्नति कौ मूल।
बिन निज भाषा  ज्ञान के,मिटै न हिय को शूल।।
     

अश्लील-हरिशंकर परसाई


अश्लील 
हरिशंकर परसाई 


शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।
दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हर एक के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।

अनुभूति


ऐ मेरे दोस्त
मैं अब तक नहीं समझ पाया
कि तेरे आने में
दिल-दिमाग़ पे छा जाने में
बात क्या है
तुम्हारे आके चले जाने में
तुम आए तो दिल ने आहिस्ता ये पूछा था
अब तुझे आने की ज़रूरत क्या थी
जो मेरी रूह तलक दर्द सा समाया हो
उसे और करीब आने की ज़रूरत क्या थी
और अब एक बार फिर
जब तुम जा रहे हो
धडकनें एक मासूम सा सवाल करती हैं
क्या जाना जरुरी है?
Image courtesy: myhonysplace.com

चार वेद, छ: शास्त्र, अठारह पुराण




चार वेद में ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का गूढ़ ज्ञान समेटे हुए सनातन धर्म विश्व का प्राचीनतम धर्म है इसकी समस्त मान्यताएँ और परम्पराएँ पूर्णतः वैज्ञानिक हैं वस्तुतः यह एक जीवन शैली है जो मनोवैज्ञानिक होने के साथ-साथ व्यावहारिक भी है। जैन धर्म हो या सिख धर्म या फिर बौद्ध धर्म सब इसी सत्य सनातन धर्म रूपी वट-वृक्ष की ही शाखाएँ हैं। इस पर आधारित अग्रोल्लिखित साहित्य समुच्चय विश्व भर में अद्वितीय है।


चार वेद -
  1. ऋग्वेद
  2. सामवेद
  3. यजुर्वेद
  4. अथर्ववेद


ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम साहित्य होने का गौरव प्राप्त है ।



उपवेद -
  1. आयुर्वेद
  2. गंधर्ववेद
  3. धनुर्वेद
  4. स्थापत्यवेद


छ:शास्त्र -

  1. शिक्षा
  2. कल्प
  3. व्याकरण
  4. निरुक्त
  5. छंद
  6. ज्योतिष

अठारह पुराण -

  1. ब्रह्म पुराण
  2. पद्म पुराण
  3. विष्णु पुराण 
  4. वायु पुराण
  5. भागवत पुराण
  6. नारद पुराण
  7. मार्कंडेय पुराण 
  8. अग्नि पुराण 
  9. भविष्य पुराण
  10. ब्रह्म वैवर्त पुराण 
  11. लिंग पुराण 
  12. वराह पुराण 
  13. स्कन्द पुराण 
  14. वामन पुराण 
  15. कूर्म पुराण
  16. मत्स्य पुराण
  17. गरुड़ पुराण
  18. ब्रह्माण्ड पुराण

उपर्युक्त १८ पुराणों में ब्रह्म पुराण सबसे प्राचीन है ।



इसमें  निम्नलिखित ग्रन्थ भी सम्मिलित कर लें तो विश्व का बड़े से बड़ा पुस्तकालय भी इसकी बराबरी कर पाने में सक्षम नहीं होगा और कदाचित् हमारे लिए कोई भी प्रश्न अनुत्तरित नहीं रहेगा। 
ये हैं-


  • श्रीमद्भगवद्गीता 
  • श्रीरामचरितमानस
धर्म की जय हो !



वर्तमान समाज में कुछ तथाकथित संत और धर्माचार्य ऐसे भी हैं जो अपना 'कल्याण' करने में तो सफल हैं किन्तु उनके आडंबरपूर्ण आचरण और कपोल कल्पित धर्मोपदेशों से समाज को बहुत बड़ी हानि हो रही है। साथ ही इन छद्मवेषधारी संतों के कारण धर्म और धार्मिकता को भी बहुत बड़ी हानि हो रही है। इनके कारण आज समाज के सभी साधु-संत और उपदेशक संदेह की दृष्टि से देखे जा रहे हैं। जो हमारे समाज लिए किसी भी प्रकार से अच्छा नहीं है। 

आज समाज में व्याप्त धार्मिक विकृतियों और विद्रूपताओं के लिए ये तथाकथित धर्मोद्धारक कम उत्तरदायी नहीं हैं। इस समय चतुर्दिक धर्म का विकृत रूप दृष्टिगोचर होता है। धार्मिक कट्टरता, दुराग्रह, और अन्य धर्मों के प्रति विद्वेष की भावना परिलक्षित हो रही है। छोटी-छोटी बातों पर लोग आक्रोशित हो जाते हैं और धर्म के मूल स्वरूप और और उद्देश्य को भूलकर आचरण करने लगते हैं। यह सब इन्हीं पथभ्रष्टकों का प्रभाव है। ये धर्म के ठेकेदार धर्म के नाम पर समाज को जोड़ने का नहीं अपितु तोड़ने का काम कर रहे हैं, जिसके लिए हमें जागरूक होने की आवश्यकता है।

ध्यान रहे ऐसे तथाकथित धर्मगुरु केवल हिन्दू धर्म में ही नहीं हैं बल्कि सभी धर्मों में हैं।

वास्तव में ये समाज में अकर्मण्यता को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। ऐसे छद्मवेषधारी संतों के धर्मोपदेशों से किसका कितना कल्याण हो रहा है यह तो कह पाना मुश्किल है, किन्तु प्रवचन सभाओं में उमड़ने वाली भारी भीड़ यह आभास अवश्य कराती है कि देश की जनशक्ति का कितना अपव्यय हो रहा है! भोले-भाले लोग इनके मकड़जाल में फँस कर अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाते हैं। यहाँ तक कि वशीकृत होकर अपने और अपनों तक को छोड़ देते हैं और गलत राह पर चल पड़ते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि कोई सद्गुरु किसी गृहस्थ को घर-बार छोड़ने के कभी नहीं कह सकता है न किसी की भावनायें भड़काने का कार्य करता है और न ही किसी उद्देश्य के लिए हिंसा और  हथियार उठाने के लिए ही कह सकता है। ऐसा व्यक्ति निश्चित रूप से ढोंगी है, बहुरूपिया है, द्रोही है और किसी निहित स्वार्थ के कारण ऐसा कर रहा है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम ऐसे लोगों को पहचानें। आँख मूँदकर किसी पर भी विश्वास कर लेने की बजाय थोड़ा विचार करें। सोचें कि जो स्वयं को ही ईश्वर बताता हो क्या वह संत हो सकता है? जो सांसारिक सुखों और भोग-विलास में लिप्त हो और धन संचय के लिए भाँति-भाँति के अनुचित कृत्य में संलग्न हो क्या ऐसा प्रवंचक हमें सन्मार्ग दिखा सकता है? क्या वास्तव में ऐसा धूर्त व्यक्ति हमारा  कल्याण कर सकता है? 

विचार करें फिर विश्वास करें।

वफ़ा के शहर में

वफ़ा के शहर में तेरी गली बदनाम लिख दूँगा,
साँसों की सदा पर मौत का पैग़ाम लिख दूँगा ।
उठेगा दर्द जब दिल में  तुम्हारे वास्ते 'पंकज',
उमीदों की चिता पर बस तुम्हारा नाम लिख दूँगा।।

बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क-09651293983

हिंदी भाषा की विशेषताएँ


हमारी भाषा : हिंदी भाषा
  • हिंदी का उद्भव भाषाओं की जननी संस्कृत से हुआ है जो आज भी तकनीकी क्षेत्र में प्रयोग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त भाषा मानी जा रही है।
हिंदी भाषा संस्कृत की बड़ी बेटी मानी जाती है।
  • हिंदी के व्याकरणिक नियम प्रायः अपवाद-रहित हैं इसलिए आसान हैं।
  • हिंदी की वर्णमाला दुनिया की सर्वाधिक व्यवस्थित वर्णमाला है। इसमें स्वरों और व्यंजनों को अलग-अलग व्यवस्थित किया गया है। इसके अतिरिक्त सभी वर्णों को उनकी उच्चारण स्थानादि की विशेषताओं के आधार पर रखा गया है।
  • हिंदी की लिपि (देवनागरी) विश्व की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है। इसमें प्रत्येक ध्वनि के लिए एक निश्चित लिपि चिह्न का प्रयोग होता है और एक लिपि चिह्न एक ही ध्वनि का प्रतिनिधित्व करता है।
  • हिंदी का शब्दकोष बहुत विशाल है जहाँ एक-एक वस्तु, कार्य, भाव आदि को व्यक्त करने के लिए सैकड़ों शब्द विद्यमान हैं। हिंदी के शब्दकोश में शब्दों की संख्या २.५ लाख से भी अधिक है और यह लगातार बढ़ती ही जा रही है।
  • हिंदी आज दुनिया की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा के रूप में प्रतिष्ठित है। गैर हिंदी भाषी देशों के लोग भी हिंदी सीख रहे हैं।
  • हिंदी पूरे भारत और दुनिया के कई देशों (अमेरिका सहित) में बोली और समझी जाने वाली भाषा है।
  • प्रयोग की दृष्टि से भी हिंदी इतनी समृद्ध है कि इसकी पाँच उपभाषाएँ और कम से कम सोलह बोलियाँ प्रचलित हैं, जिनमें से कई बोलियों और उपभाषाओं में भी प्रचुर साहित्य उपलब्ध है।
  • हिंदी बहुत सरल और लचीली भाषा है जिसे सीखने में विशेष कठिनाई नहीं होती।
  • हिंदी भाषा में जो लिखा जाता है वही (उसी रूप में) पढ़ा भी जाता है। अतः इसके लेखन और उच्चारण में स्पष्टता है।
  • हिंदी दुनिया की सर्वाधिक तीव्रता से प्रसारित हो रही भाषाओं में से एक है।
  • कंप्यूटर और इंटरनेट पर भी हिंदी का प्रयोग बहुत तेजी से बढ़ रहा है। आज प्रायः हर विषय पर सामग्री हिंदी में प्राप्त की जा सकती है।
  • ऐसे समय में जबकि सारी दुनिया की निगाहें भारत की ओर लगी हैं, भारत के विकास के साथ ही दुनिया में हिंदी का महत्व बढ़ना भी निश्चित है।
  • देश को पुन: विश्वगुरु बनाने के साथ ही हिंदी को भी विश्वभाषा बनाने का संकल्प लें।
कृपया मातृभाषा का प्रयोग करें ; हिंदी का प्रयोग करें।







चित्र साभार: ashokvichar.blogspot.com