मिर्ज़ा ग़ालिब के १५ बेहतरीन शेर || 15 Best Sher-Shayri of Mirza Ghalib

"ग़ालिब तेरे क़लाम में क्योंकर मज़ा न हो,
पीता हूँ रोज़ धोकर शीरीं सुखन के पाँव।"
मिर्ज़ा ग़ालिब के जैसा शायर अब शायद दुबारा नहीं होगा। उनकी शख्शियत, ज़िन्दगी के हर पहलू पर उनका नज़रिया, उनका अंदाजे बयाँ, उनकी कलम और उनका क़लाम उन्हें बेजोड़ बनाता है। यूँ तो ग़ालिब साहब मूलतः फ़ारसी के शायर हैं फिर भी उन्होंने उर्दू में जितना लिखा है, उर्दू अदब के बाक़ी सारे क़लमकारों को मिला देने से भी उसकी बराबरी न हो सकेगी।

उनकी प्रसिद्धि का आलम यह है कि बड़े-बुज़ुर्ग तो छोडिए नए लड़के भी अक्सर बोलते रहते हैं - "हमारी शख्शियत का अंदाज़ा तुम क्या लगाओगे 'गालिब'.. । आप ज़िन्दगी के किसी भी मोड़ पे हों मिर्जा ग़ालिब की शायरी आपके साथ खड़ी मिलेगी। मोहब्बत, बेवफाई, रुसवाई पर तो उन्होंने खूब लिखा ही है, ज़िन्दगी से लेकर जन्नत तक के बाक़ी मौज़ूआत पर भी उन्होंने भरपूर लिखा है और बहुत ख़ूब लिखा है।

आज इस बेहद मशहूर, हर दिल अजीज़ शायर जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मदिन है। आइए इस मौक़े पर पढ़ते हैं उनके कुछ चुनिन्दा, बेहतरीन शेर जो मुझे बहुत पसंद हैं और मैं उम्मीद करता हूँ कि आपको भी पसंद आयेंगे। वैसे मैंने कोशिश की है कि ग़लतियाँ कम से कम हों लेकिन चूँकि मुझे उर्दू की कोई ख़ास जानकारी नहीं है इसलिए गलतियों के लिए माफ़ी चाहूँगा और यह भी गुज़ारिश करूँगा कि जहाँ ग़लतियाँ हैं उन्हें आप सही करेंगे।

पेश-ए-ख़िदमत है-


१.
बस कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना।
आदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना।।



२.
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं जिस क़ाफ़िर पे दम निकले।



३.
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना।
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।।



४.
तोड़ा कुछ इस अदा से ताल्लुक उसने ग़ालिब,
कि हम सारी उम्र अपना क़ुसूर ढूँढ़ते रहे।



५.
हमने माना कि तग़ाफुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जायेंगे हम तुझको ख़बर होने तक।



६.
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वरना हम भी आदमी थे काम के।



७.
आईना क्यों न दूँ कि तमाशा कहें जिसे।
ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे।।



८.
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक,
वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है।



९.
बेवजह नहीं रोता कोई इश्क़ में ग़ालिब
जिसे ख़ुद से बढकर चाहो वो रुलाता ज़रूर है।



१०.
ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता।
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।।



११.
ग़ालिब शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या वो जगह बता जहाँ पर ख़ुदा न हो।



१२.
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल के बहलाने को ग़ालिब ख़याल अच्छा है।



१३.
दर्द देकर सवाल करते हो।
तुम भी ग़ालिब कमाल करते हो।।
देखकर पूछ लिया हाल मेरा।
चलो कुछ तो ख़याल करते हो।।



१४.
फिर उसी बेवफा पे मरते हैं,
फिर वही ज़िन्दगी हमारी है।।
बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब,
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है।।



१५.
हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।
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निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए थे लेकिन।
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।




परिचय-रामधारी सिंह 'दिनकर':: सलिल कण हूँ कि पारावार हूँ मैं?

बँधी है लेखनी लाचार हूँ मैं



सलिल कण हूँ, कि पारावार हूँ मैं?
स्वयं छाया, स्वयं आधार हूँ मैं?
बँधा हूँ, स्वप्न हूँ, लघु वृत हूँ मैं,
नहीं तो व्योम का विस्तार हूँ मैं।


समाना चाहता, जो बीन उर में,
विकल उस शून्य की झंकार हूँ मैं।
भटकता खोजता हूँ, ज्योति तम में,
सुना है ज्योति का आगार हूँ मैं।

जिसे निशि खोजती तारे जलाकर,
उसी का कर रहा अभिसार हूँ मैं।
जनम कर मर चुका सौ बार लेकिन,
अगम का पा सका क्या पार हूँ मैं।

कली की पंखुडीं पर ओस-कण में,
रंगीले स्वप्न का संसार हूँ मैं।
मुझे क्या आज ही या कल झरुँ मैं,
सुमन हूँ, एक लघु उपहार हूँ मैं।

मधुर जीवन हुआ कुछ प्राण! जब से,
लगा ढोने व्यथा का भार हूँ मैं।
रुदन अनमोल धन कवि का,
इसी से ही पिरोता आँसुओं का हार हूँ मैं।

मुझे क्या गर्व हो अपनी विभा का,
चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं।
पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी,
समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं।

न देखे विश्व, पर मुझको घृणा से,
मनुज हूँ, सृष्टि का शृंगार हूँ मैं।
पुजारिन, धूलि से मुझको उठा ले,
तुम्हारे देवता का हार हूँ मैं।

सुनूँ क्या सिंधु, मैं गर्जन तुम्हारा,
स्वयं युग-धर्म की हुंकार हूँ मैं।
कठिन निर्घोष हूँ भीषण अशनि का,
प्रलय-गांडीव की टंकार हूँ मैं।

दबी सी आग हूँ भीषण क्षुधा का,
दलित का मौन हाहाकार हूँ मैं।
सजग संसार, तू निज को सम्हाले,
प्रलय का क्षुब्ध पारावार हूँ मैं।

बँधा तूफान हूँ, चलना मना है,
बँधी उद्याम निर्झर-धार हूँ मैं।
कहूँ क्या, कौन हूँ, क्या आग मेरी,
बँधी है लेखनी, लाचार हूँ मैं।

~रामधारी सिंह 'दिनकर'

हिंदी अंक (देवनागरी) || Hindi digits/numbers

"अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बौ : अस्सी नब्बे पूरे सौ"

हिंदी के मानकीकरण के अनेक अदूरदर्शी प्रयासों ने आज हिंदी के अंको की स्थिति यह कर दी है कि सामान्य शिक्षार्थी तो क्या हिंदी के शिक्षक भी हिंदी (देवनागरी) में लिखी संख्याओं को पढ़ने में अचकचा जाते हैं। एकरूपता के चक्कर में या थोड़े से आलस्य के कारण अथवा कदाचित किसी कुचक्र में फँसकर हम अपनी जड़ों से कैसे कटते जा रहे हैं शायद हमें कभी इस पर विचार करने की फुरसत नहीं मिली? आज से २० साल बाद जब हमारे बच्चे किसी पुरानी पुस्तक में लिखी हिंदी की गिनतियाँ समझ पाने में असमर्थ होंगे तो आखिर हम किसको दोष देंगे? रोमन अंकों को अंतर्राष्ट्रीय अंक कहकर क्या हमने यह मान लिया है कि हिंदी के अंक अन्तराष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित हो पाने की योग्यता ही नहीं रखते? और इसलिए क्या हम देवनागरी के अंकों को तिलांजलि दे दें? ज़रा इन प्रश्नों पर विचार करें।

हमारे नीति-नियंताओं ने आजादी के बाद से अब तक हिंदी को दयनीय दशा में पहुँचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। स्वतंत्रता आन्दोलन के समय देश के जनजन की आवाज बनकर गूँजने वाली हिंदी आज सत्तर साल बीत जाने के बाद भी संवैधानिक रूप से राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं प्राप्त पायी है। हिंदी को उसका वास्तविक स्थान दिलाने के होने वाले सारे प्रयासों को बड़े ही नियोजित तरीके से विफल किया जाता रहा है। हिंदी को सरल बनाने के नाम पर (जबकि यह पहले से बहुत ही सरल और स्पष्ट भाषा है) तथाकथित भाषाविदों ने इसकी कमर तोड़ दी है। कोई कहता है कि कम्प्यूटर में तो अमुक चिह्न ऐसे बनता है इसलिए हमें हिंदी की अमुक वर्तनी में परिवर्तन करना ज़रूरी है। कोई सुझाव देता है कि हिंदी में अमुक विराम चिह्न लगाने में  समय ज्यादा लगता है इसलिए हमें अंग्रेजी वाला फुल स्टॉप हिंदी में भी प्रयोग कर लेना चाहिए। कोई कहता है कि अमुक शब्द का उच्चारण करने में समस्या हो रही है इसलिए इसको ऐसे नहीं ऐसे बोला जाय। अरे भई! अंग्रेजी बोलते-बोलते आपके मुखावयव कमजोर पड़ गए हैं, आपका मुँह पूरा खुलता ही नहीं तो आप उसका इलाज कीजिए, थोड़ी कसरत कीजिये, योग-प्राणायाम आदि का सहारा लीजिये; दूसरों को क्यों भ्रमित करते हैं।

अजीब स्थिति हो गयी है। बच्चा 'भर' को 'मर' लिख रहा है तो उसे सही अक्षर सिखाने की बजाय हम 'मर' को ही 'भर' मान लें और उसे यही लिखने दें? कितनी हास्यास्पद बात है! अगर दो-चार अक्षरों या चिह्नों को लिखने में दिक्कत हो रही है तो क्या हम उसके लिए हम देवनागरी के स्वरुप को ही विकृत कर देंगे? क्या हम उन विसंगतियों को दूर करने का प्रयास नहीं कर सकते? आज जबकि दुनियाभर में भारत के सॉफ्टवेर इंजीनियरों की तूती बोल रही है क्या हम दो-चार उत्साही लड़कों को लगाकर इसके लिए सॉफ्टवेयर नहीं तैयार करवा सकते? करने को तो हम सब कर सकते हैं लेकिन वास्तविकता यह है कि हम करना ही नहीं चाहते। तमाम हिंदी प्रेमियों ने अपने स्तर से हिंदी के लिए बहुत से काम किये हैं जिससे कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करना बहुत आसान हो गया है। प्रयोक्ताओं की तेजी से बढ़ती संख्या के कारण गूगल और माइक्रोसोफ्ट जैसी बड़ी कंपनियों ने भी अपने व्यापार को दृष्टिगत रखते हुए कम्प्यूटर और इंटरनेट में काफी कुछ हिंदी में उपलब्ध करवा दिया है। यूनिकोड फॉण्ट से लेकर शब्द संसाधक और ऑपरेटिंग सिस्टम तक सब कुछ हिंदी में उपलब्ध है। फ़ोन में एण्ड्रोइड ऑपरेटिंग सिस्टम के आ जाने से और भी सुविधा हो गयी है।


हिंदी के अंकों की बात करें तो उसके प्रयोग में तो कहीं कोई समस्या है ही नहीं। हम इन्हें मनचाहे रूप में कम्प्यूटर में टाइप भी कर सकते हैं और साधारण हिंदी जानने वाला कोई भी व्यक्ति इन अंकों को सम्प्रति समझ भी सकता है। लेकिन यही स्थिति रही तो आने वाले समय में ये सरस्वती नदी की भाँति विलुप्त हो जायँ तो यह कोई आश्चर्य की बात न होगी। अच्छा, कुछ लोग तो अनायास ही अंग्रेजी घुसेड़ने के मौके तलाशते रहते हैं। मेरा अपना अनुभव है जब मैं किसी सज्जन को अपना नंबर बताता हूँ तो मजाल क्या कि बिना अंग्रेजी का प्रयोग किये भला मानुष समझ पाये!  मैं उनतालीस बोलूँगा तो सामने वाले सज्जन के मुँह से तुरंत निकलेगा - "थर्टी नाइन ना ?" बच्चों की दशा का क्या कहें! पहली कक्षा के किसी बच्चे से टू प्लस टू पूछिए तुरंत उत्तर देगा-"फ़ोर", और आप यह पूछ लीजिए कि दो धन दो कितना होगा तो बेचारा मुँह ताकने लगेगा। क्या हम उस बच्चे के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं या फिर हिंदी के? समय मिले तो कृपया विचार कीजिएगा।

बंधुओं आप सब से अनुरोध है कि कोई कुछ करे न करे आप अपने स्तर से यथासंभव प्रयास अवश्य करें।अपने बच्चों को बेशक अंग्रेजी सिखायें किंतु हिंदी के अंकों का ज्ञान भी उसे अवश्य दें और स्वयं भी हिंदी के अंकों का प्रयोग करें।

नीचे की सारिणी में कम्प्यूटर से ही टाइप किये गये देवनागरी-अंक दिए गए हैं-
हिंदी अंक-देवनागरी लिपि
शब्दों में
अंग्रेजी अंक-रोमन लिपि
(तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय अंक)
शून्य
0
एक
1
दो
2
तीन
3
चार
4
पाँच
5
छह
6
सात
7
आठ
8
नौ
9
"अपने बच्चे को कुछ भी बनाएँ लेकिन उसे हिंदी अवश्य पढ़ाएँ"

इस पार प्रिये, मधु है तुम हो || love Poem 'iss paar uss paar

'इस पार उस पार' हरिवंशराय बच्चन जी का सुंदर प्रणय गीत है। कवि प्रेयसी से, स्वयं से या कहें हम सब से कहता है- इस पार प्रिये मधु है, तुम हो; उस पार न जाने क्या होगा! और विषद अर्थों में यह जीवन का सूत्र है कि प्रियतम के बिना संसार सारहीन है। प्रेम के बिना सारा जग सारहीन है, निरर्थक है और जहाँ प्रेम है वहीं जीवन की सार्थकता है।

आइये पढ़ते हैं बच्चन जी की यह प्रसिद्ध कविता-


इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

यह चाँद उदित होकर नभ में, कुछ ताप मिटाता जीवन का,
लहरा-लहरा यह शाखाएँ, कुछ शोक भुला देतीं मन का,
कल मुर्झाने वाली कलियाँ, हँसकर कहती हैं मगन रहो,
बुलबुल तरु की फुनगी पर से, संदेश सुनाती यौवन का,
तुम देकर मदिरा के प्याले, मेरा मन बहला देती हो,
उस पार मुझे बहलाने का, उपचार न जाने क्या होगा!

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

जग में रस की नदियाँ बहती, रसना दो बूंदें पाती है,
जीवन की झिलमिलसी झाँकी, नयनों के आगे आती है,
स्वरतालमयी वीणा बजती, मिलती है बस झंकार मुझे,
मेरे सुमनों की गंध कहीं यह वायु उड़ा ले जाती है!
ऐसा सुनता, उस पार प्रिये, ये साधन भी छिन जाएँगे,
तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा!

इस पार प्रिये मधु है, तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा!

प्याला है पर पी पाएँगे, है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नियति ने भेजा है, असमर्थ बना कितना हमको,
कहने वाले, पर कहते है, हम कर्मों में स्वाधीन सदा,
करने वालों की परवशता है ज्ञात किसे, जितनी हमको?
कह तो सकते हैं कहकर ही, कुछ दिल हलका कर लेते हैं,
उस पार अभागे मानव का, अधिकार न जाने क्या होगा!

मेरा प्यार भी अजीब था || Ye jo ishq hai



ये जो इश्क है वो जूनून है, वो जो न मिला वो नसीब था।
वो पास हो के भी दूर था, या दूर हो के करीब था ।।

मेरे हौसले का मुरीद बन या दे मुझे तू अब सजा।
तू ही दर्श था तू ही ख्वाब था, तू ही तो मेरा हबीब था।।

उस शहर की है ये दास्ताँ, जहाँ बस हमी थे दरमियाँ।
न थी दुआ, न थी मेहर, न तो दोस्त था न रकीब था।।

करता रहा दिल को फ़ना, जिसे लोग कहते थे गुनाह।
एक अजनबी पे था आशना, मेरा प्यार भी अजीब था।।

'अज्ञात'

तुम मुझमें प्रिय फिर परिचय क्या : एक प्रेम कविता || Love Poem

प्रेम, रहस्यवाद और उस अज्ञात प्रियतम से एकाकार हो जाने के भावों को अभिव्यंजित करती हुई महादेवी वर्मा की एक सुंदर कविता-
love poem in hindi



तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या?
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति,
पलकों में नीरव पद की गति,
लघु उर में पुलकों की संसृति,
           भर लाई हूँ तेरी चंचल!
           और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरुणोदय,
परछाई रजनी विषादमय,
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
           खेल खेल थक थक सोने दे!
           मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला,
           फिर पूछूँ क्या मेरे साकी!
           देते हो मधुमय विषमय क्या?

रोम रोम में नंदन पुलकित,
साँस साँस में जीवन शत शत,
स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित,
           मुझमें नित बनते मिटते प्रिय!
           स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या?

हारूँ तो खोऊँ अपनापन
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन,
जीत बनूँ तेरा ही बंधन,
           भर लाऊँ सीपी में सागर!
           प्रिय मेरी अब हार विजय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम,
तू असीम मैं सीमा का भ्रम,
           काया छाया में रहस्यमय,
           प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या!
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या?
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वायु प्रदूषण और पीएम 2.5 | PM2.5

वायु प्रदूषण और पीएम 2.5  ऐसे शब्द हैं जो इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा में हैं। आइये हम वायु प्रदूषण के ही सन्दर्भ में पीएम 2.5 के बारे में जानते हैं। 
वायुमण्डल हमारे पर्यावरण का एक महत्वपूर्ण भाग है। वायुमण्डल से ही हम अपने जीवन के लिए अनिवार्य प्राणवायु ग्रहण करते हैं जिसे वैज्ञानिक शब्दावली में ऑक्सीजन (O2) के नाम से जाना जाता है। यह प्राणवायु हमारे लिए कितनी आवश्यक है इस बात का अनुमान ऐसे कर सकते हैं कि-
"बिना भोजन के हम २० दिनों तक जीवित रह सकते हैं। बिना जल के ७ दिनों तक जीवित रहा जा सकता है। किन्तु प्राणवायु के अभाव में मनुष्य ७ मिनट भी जीवित नहीं रह सकता।"

यही प्राणदायिनी वायु आज इतनी विषैली होती जा रही है कि हमारे प्राणों के लिए ही घातक बन गयी है।

इन दिनों ये ख़बरें लगातार सुर्ख़ियों में हैं कि भारत के अमुक राज्य में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है। चारों तरफ स्मॉग फैला हुआ है। पूरा परिक्षेत्र गैस चैम्बर में तब्दील हो गया है। स्कूल, कॉलेज तक बंद करने की नौबत आ गयी है। इस दौरान वायु में पीएम2.5 की मात्रा मानक से १० गुना तक ज्यादा पाई गयी है।
धूल और धुएँ के सम्मिलित रूप को स्मॉग कहते हैं।
स्मोक + फॉग = स्मॉग | smoke+fog=smog

क्या है पीईम2.5 ?

पीएम 2.5 (PM2.5) अंग्रेजी के Atmospheric particulate matter (एटमोस्फेरिक पार्टिकुलेट मैटर) का संक्षिप्त रूप है। पीएम 2.5 से आशय वायुमंडल में मौजूद उन हानिकारक कणों से है जिनका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे भी कम होता है। यह पीएम10 का भी चौथाई हिस्सा होता है।
"पीएम 2.5 उस कण को कहते हैं जिसका आकार 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है।"
पीएम2.5 का आकार कितना कम है इसका अनुमान आप ऐसे लगा सकते हैं कि यह बालों की मोटाई का मात्र ३ प्रतिशत होता है। इतने छोटे कणों को शरीर के भीतर प्रवेश करने से रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।

पीएम 2.5 कैसे बनते हैं ?

इस समय सबसे बड़ी चिल्लपों इस बात को लेकर है कि पार्टिकुलेट मैटर किसानों द्वारा किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पराली (फसलों के अवशेष) के कारण उत्पन्न होता है। हालाँकि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि फसलों का जलाया जाना इसका एक कारण है किन्तु इसके आलावा भी कई अन्य कारण हैं जिनसे पार्टिकुलेट मैटर वायुमंडल में मिलता है। जैसे-
  • मोटर गाड़ियों और वायुयानों से निकलने वाला धुआँ।
  • पॉवर प्लांट्स से उत्सर्जित होने वाली विषैली गैसें जैसे  सल्फ़र डाई ऑक्साइड ।
  • जंगलों में लगने वाली आग।
  • कूड़े और टायरों आदि को जलाना।
  • पेड़ों की अंधाधुंध कटान से भी इनका अवशोषण कम होता है और वायुमंडल प्रदूषित होता है।
  • सड़कों पर उड़ने वाली धूल और भवन निर्माण स्थलों पर उड़ने वाली गंदगी इत्यादि।

पीएम 2.5 क्यों है खतरनाक?

जैसा कि हम जानते हैं जो वस्तु जितनी हल्की होगी, वायुमंडल में उतनी ही ज्यादा देर तक रहेगी। चूँकि पीएम 2.5 बेहद हलके कण होते हैं इसलिए ये हवा में लंबे समय तक बने रहते हैं। इस कारण इनके साँस के जरिये शरीर के अन्दर प्रवेश कर जाने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। ये कण इतने छोटे होते हैं कि नाक और गले को पार करते हुए ये हमारे श्वसन तंत्र तक पहुँच सकते हैं। और तो और इनके रुधिर परिसंचरण तंत्र तक पहुँचने की भी संभावनाएँ होती हैं।
"पीएम २.५ जानवरों और पशु-पक्षियों के लिए भी उतना ही खतरनाक है जितना मनुष्यों के लिए।"
अब आप आसानी से समझ सकते हैं कि ये पीएम 2.5 किस हद तक खतरनाक हैं। इनसे फेफड़े और श्वास सम्बन्धी रोग तो होते ही हैं इसके अलावा हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा भी बढ़ जाता है। आँखों तथा गले में जलन जैसे सामान्य लक्षण भी आसानी से देखने को मिलते हैं।  छोटे बच्चों, साँस के मरीजों और वयोवृद्ध लोगों के लिए यह खतरा और भी ज्यादा होता है।
शोधों से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि वायु प्रदूषण के कारण जीवन-प्रत्याशा (अनुमानित आयु) लगातार घट रही है।

कैसे बचा जाय इस खतरे से ?

वैसे तो वायु प्रदूषण से बचने के लिए वृहद् स्तर पर त्वरित प्रयासों की आवश्यकता है तभी इस समस्या से निपटा जा सकता है। फिर भी हम व्यक्तिगत स्तर पर कुछ सावधानियाँ अपनाकर इसके दुष्प्रभावों से काफी हद तक बच सकते हैं। जैसे-
  • अत्यधिक प्रदूषण की स्थिति में घर के अंदर ही रहने की कोशिश करें।
  • ऐसे खिड़की-दरवाजे यथासंभव बंद रखें जिनसे प्रदूषित वायु घर के अंदर प्रवेश कर सके।
  • बंद कमरे में धूप, अगरबत्ती इत्यादि न जलाएँ। अन्यथा की स्थिति में इनका प्रयोग कम से कम करें।
  • कूड़े और टायर जैसी वस्तुओं को कभी न जलाएँ। उन्हें सही जगह पर निस्तारित करें।
  • अपने घर के आसपास ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे और वनस्पतियाँ उगाएँ। ये प्रदूषण को अवशोषित करते हैं।
  • एयर प्योरीफायर का प्रयोग करें। ध्यान रखें प्योरीफायर HEPA (हेपा) फ़िल्टर से युक्त हो।
  • घर से बाहर निकलते समय अच्छी गुणवत्ता का मास्क पहनें।
  • यदि आप किसान हैं तो कृपया खेतों में फसलों के अवशेष न जलाएँ। उन्हें खेत में ही सड़ाकर अच्छी खाद बनायी जा सकती है।

"अपनी जिम्मेदारी निभाएँ ; प्रदूषण न फैलाएँ "।

जिसने पाप न किया हो



बात बहुत पुरानी है। किसी राज्य में एक राजा राज करता था। वह बहुत ही न्यायप्रिय था। उसके राज्य में अपराधियों के लिए कड़े दण्ड का प्रावधान था। चोरों को फाँसी पर लटका दिया जाता था।

एक बार एक चोर को चोरी करते हुए पकड़ा गया। अपराध सिद्ध होने पर राजा ने चोर को नियमानुसार फाँसी की सजा सुनाई। चोर सजा भुगतने के लिए सहर्ष तैयार हो गया लेकिन उससे पहले उसने राजा से कहा हुजूर मैं एक गुप्त विद्या जानता हूँ जो मैं मारने से पहले आपको सिखाकर जाना चाहता हूँ। ताकि यह विद्या मेरे मरने साथ खत्म न हो जाय। महाराज मैं सोने की खेती करना जानता हूँ।

राजा ने चोर को अपने पास बुलवाया और पूछा- सोने की खेती कैसे की जाती है? बताओ!
चोर बोला- महाराज! सवा किलो सोने के, मटर के बराबर दाने सुनार से बनवाकर मँगा दीजिए। मैं राजमहल की चहारदीवारी में ही क्यारी बनाकर उन्हें बोउँगा। जब तक सोने के दाने आएँगे, तब तक मैं क्यारियाँ तैयार कर लूँगा। राजा ने चोर की बात मान ली और सोने के बीज तैयार करने का आदेश दे दिया। इधर चोर ने फावड़ा लिया, फावड़े से मिट्टी खोदी। फिर खुरपी और हाथों की सहायता से मिट्टी तैयार की। तब तक सोने के दाने भी आ गए।

चोर ने राजा से कहा- मुझे अपने उस गुरु की बात याद आ गई जिनसे मैंने यह विद्या सीखी थी। मैं चोरी करते हुए रँगे हाथों पकड़ा गया हूँ इसलिए मैं अपने हाथों से यह सोने के दाने नहीं बो सकता। सोने की खेती सिर्फ वही कर सकता है जिसने अपने जीवन में कभी भी चोरी या कोई गलत काम अर्थात जिसने कोई पाप न किया हो। अन्यथा ये जमीन में पड़े रह जाएँगे, उगेंगे नहीं। बहुत अच्छा होगा महाराज यदि आप ही अपने शुभ हाथों से इन्हें बो दें।

राजा शर्मिंदा होते हुए बोला- मैंने तो एक षड्यंत्र के तहत पहले राजा को मरवा कर राजगद्दी हथियाई थी, इसलिए पापी तो मैं भी हुआ। मैं ये दाने नहीं बोउँगा। इसके बाद राजा ने एक-एक कर सभी मंत्रियों को बुलाया और सोने की खेती की शर्त बताई। लेकिन एक भी मंत्री ऐसा नहीं निकला जिसने कभी कोई चोरी, षड्यंत्र या पाप न किया हो। राजा चोर से बोला- यहाँ सभी चोर हैं इसलिए सोने की खेती नहीं हो सकती।

राजा की बात सुनकर चोर ने कहा- महाराज, जिस राज्य का राजा पापी हो, सारे मंत्री चोर हों वहाँ प्रजा को मामूली चोरी के लिए फाँसी पर चढ़ा देना कहाँ का न्याय है?

चोर की बुद्धिमत्ता और वाक्पटुता देखकर राजा ने उसकी सजा माफ कर दी और उसे अपना सलाहकार नियुक्त कर लिया।

सच है मित्रों, दूसरों के ऊपर दोषारोपण करने से पहले हम अपने अंदर झाँकना चाहिए। हम सब के अंदर कुछ न कुछ बुराइयाँ हैं। आवश्यकता है अपनी उन बुराइयों को पहचानने की और उन्हें दूर करने की।

ये पंक्तियाँ प्रासंगिक हैं-

"बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोज आपना, मुझसे बुरा न कोय।।"


प्रेम की उत्कृष्ट कविता | Love poem - रात आधी खींच कर मेरी हथेली

"कोशिश करने वालों की हार नहीं होती" का सुंदर संदेश देने वाले प्रख्यात कवि और लेखक 'हरिवंश राय बच्चन' का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। उनकी लोकप्रिय कृति 'मधुशाला' की पंक्तियाँ हर साहित्य प्रेमी की जुबान पर होती हैं। सूफी दर्शन से ओतप्रोत 'मधुशाला' एक ऐसी अनुपम कृति है जिसकी प्रसिद्धि के आयाम को २०वीं सदी के बाद की कोई दूसरी रचना अब तक नहीं प्राप्त कर पायी है।

मधुशाला के अलावा भी भी उनकी अन्य रचनाएँ जैसे मधुकलश, निशा निमंत्रण, धार के इधर उधर, मिलन यामिनी, आकुल अंतर, प्रणय पत्रिका इत्यादि सब एक से बढ़कर एक हैं और सभी रचनाएँ भाव और शिल्प दोनों ही दृष्टिकोण से श्रेष्ठ हैं

लेकिन दोस्तों, आज हम यहाँ बात कर रहे हैं उनकी एक ऐसी कविता की जो शायद हिंदी साहित्य में लिखे गए सर्वश्रेष्ट प्रेम गीतों में स्थान पाने की योग्यता रखती है। प्रेम और वेदना की जिस भाव-भूमि पर उतर कर कवि ने इस कविता को रचा है वह किसी भी सहृदय के के मन के तारों को झंकृत कर देने के लिए काफी है।सोने पे सुहागा यह कि इसका शिल्प-विधान और शब्द चयन भी उनकी अन्य रचनाओं की तरह ही उत्कृष्ट है। यह बात अलग है कि यह रचना, पता नहीं क्यों, उतनी प्रसिद्द नहीं हुई जितना वास्तव में इसे होना चाहिए था।

आइये पढ़ते हैं उनकी कविता- "रात आधी खींचकर मेरी हथेली"

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने।

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी।
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी।
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा सा और अधसोया हुआ सा।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने।

एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में।
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में।
मैं लगा दूँ आग इस संसार में
है प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर।
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने।

प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ उजाले में अँधेरा डूब जाता।
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता।
एक चेहरा सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा।
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने,
पर ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने।

और उतने फ़ासले पर आज तक
सौ यत्न करके भी न आये फिर कभी हम।
फिर न आया वक्त वैसा
फिर न मौका उस तरह का
फिर न लौटा चाँद निर्मम।
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं?
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।

रात आधी खींच कर मेरी हथेली
एक ऊँगली से लिखा था प्यार तुमने।



हिंदी भाषा के सम्बन्ध में स्वामी विवेकानंद का एक प्रेरक प्रसंग

उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान्निबोधयत्
स्वामी विवेकानंद विश्वविख्यात धर्माचार्य और विद्वान थे। उन्हें हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी सहित अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं का ज्ञान था। वास्तव में जिस संत ने अपने संबोधन से अमेरिका वासियों को मंत्रमुग्ध कर दिया हो उसके अंग्रेजी भाषा के ज्ञान के विषय में भला किसे संदेह हो सकता है। किन्तु उन्हें अपनी संस्कृति के साथ-साथ अपनी मातृभाषा से भी गहरा प्रेम था। वे अपनी संस्कृति से जुड़ी समस्त वस्तुओं में मातृभाव रखते थे और उनका सम्मान करते थे।
हिंदी भाषा के प्रति भी उनके मन में यही भाव था। वे हिंदी को 'माँ' के समान मानते थे। 

उनसे जुड़ा यह प्रसंग बहुत रोचक और प्रेरणादायी है।



स्वामी विवेकानंद एक बार विदेश गए। वहाँ उनके अनेक प्रशंसक उनसे मिलने के लिए आये हुए। थे उन लोगों ने स्वामी जी की तरफ हाथ मिलाने के लिए बढ़ाया और अपनी सभ्यता के अनुसार अंग्रेजी में 'हेलो' (Hello) कहा जिसके जवाब में स्वामी जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा- 'नमस्ते'। उन लोगों ने सोचा शायद स्वामी जी को अंग्रेजी नहीं आती है। 
तब उनमें से एक ने हिंदी में पूछा "आप कैसे हैं"?

स्वामी जी ने सहज भाव से उत्तर दिया  "आई ऐम फाइन, थैंक यू" (I am fine, thank you !)

उन लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने स्वामी जी से पूछा-
"जब हमने आपसे अंग्रेजी में बात की तो आपने हिंदी में उत्तर दिया और जब हमने हिंदी में पूछा तो आपने अंग्रेजी में जवाब दिया। इसका क्या कारण है" ?

इस पर स्वामी जी ने बहुत ही सुंदर जवाब दिया।

"उन्होंने कहा-"जब आप अपनी माँ का सम्मान कर रहे थे तब मैं अपनी माँ का सम्मान कर रहा था और जब आपने मेरी माँ का सम्मान किया तब मैंने आपकी माँ का सम्मान किया"।
उनका यह उत्तर सुनकर सभी श्रद्धावनत हो गए ।

मित्रों ! हिंदी हमारी मातृभाषा है और हमें इस पर गर्व होना चाहिए। अंग्रेजी अथवा अन्य विदेशी भाषाओं का ज्ञान होना अच्छी बात है परंतु विदेशी भाषा सीख लेने पर अपनी ही भाषा को कमतर आँकना, अनावश्यक दिखावा करना और हिंदी बोलने वालों को नीचा दिखाना सर्वथा अनुचित है और हमें इस प्रवृत्ति से बचना होगा।  

मैं व्यक्तिगत रूप से ऐसे कई व्यक्तियों को जानता हूँ जिनका अंग्रेजी भाषा का ज्ञान और सम्प्रेषण कौशल किसी जन्मजात अंग्रेजी बोलने वाले से कम न होगा लेकिन वे सामान्य रूप से हिंदी का ही प्रयोग करते हैं और उन्हें इस पर गर्व है। और जो अंग्रेजी नहीं जानते उन्हें इसको लेकर कभी भी शर्मिंदा नहीं होना चाहिए।


"हमें अंग्रेजी नहीं आती यह शर्म की बात नहीं है; शर्म की बात तो यह है कि हम अपनी मातृभाषा को छोड़कर किसी अन्य भाषा को बोलने में अपनी शान समझने लगते हैं। "

'आचार्य विनोबा भावे' ने कहा था - "मैं दुनिया की सभी भाषाओं की इज्जत करता हूँ पर मेरे देश में हिंदी की इज्जत न हो यह मैं सह नहीं सकता" ।


राष्ट्रभाषा का प्रयोग करें। हिंदी का प्रयोग करें ।।



मेरा नया बचपन / mera naya bachpan


बार-बार आती है मुझको मधुर याद बचपन तेरी।

गया, ले गया तू जीवन की सबसे मस्त खुशी मेरी॥


चिंता रहित खेलना-खाना वह फिरना निर्भय स्वच्छंद।

कैसे भूला जा सकता है बचपन का अतुलित आनंद॥


ऊँच-नीच का ज्ञान नहीं था छुआछूत किसने जानी?

बनी हुई थी वहाँ झोंपड़ी और चीथड़ों में रानी॥


किये दूध के कुल्ले मैंने चूस अँगूठा सुधा पिया।

किलकारी किल्लोल मचा कर सूना घर आबाद किया॥


रोना और मचल जाना भी क्या आनन्द दिलाते थे।

बड़े-बड़े मोती से आँसू जयमाला पहनाते थे॥


मैं रोई माँ काम छोड़कर, आई मुझको उठा लिया।

झाड़-पोंछ कर चूम-चूम गीले गालों को सुखा दिया॥


दादा ने चंदा दिखलाया नेत्र नीर-युत दमक उठे।

धुली हुई मुस्कान देख कर सबके चेहरे चमक उठे॥


वह सुख का साम्राज्य छोड़ कर मैं मतवाली बड़ी हुई।

लुटी हुई, कुछ ठगी हुई-सी दौड़ द्वार पर खड़ी हुई  ॥


लाज भरी आँखें थी मेरी, मन में उमंग रंगीली थी।

तान रसीली थी कानों में चंचल छैल छबीली थी॥


दिल में एक चुभन-सी थी, यह दुनिया अलबेली थी।

मन में एक पहेली थी मैं सबके बीच अकेली थी॥


मिला, खोजती थी जिसको हे बचपन! ठगा दिया तूने।

अरे जवानी के फँदे  में  मुझको  फँसा  दिया तूने॥


सब गलियाँ उसकी भी देखी उसकी ख़ुशी न्यारी है।

प्यारी, प्रीतम की रँग-रलियों की स्मृतियाँ भी प्यारी हैं॥


माना मैंने युवा काल का जीवन ख़ूब निराला है।

आकांक्षा, पुरुषार्थ-ज्ञान का उदय मोहने वाला है॥


किन्तु यहाँ झंझट है भारी युद्ध-क्षेत्र संसार बना।

चिंता के चक्कर में पड़कर जीवन भी है भार बना॥


आ जा बचपन! एक बार फिर दे दे अपनी निर्मल शान्ति।

व्याकुल व्यथा मिटाने वाली यह अपनी प्राकृत विश्रांति॥


वह भोली -सी मधुर सरलता, वह प्यारा जीवन निष्पाप।

क्या आकर फिर मिटा सकेगा तू मेरे मन का संताप ?


मैं बचपन को बुला रही थी बोल उठी बिटिया मेरी ।

नंदन वन-सी फूल उठी वह छोटी-सी कुटिया मेरी ॥

हे री मैं तो प्रेम दिवानी




हे री मैं तो प्रेम-दिवानी मेरो दरद न जाणै कोय।

घायल की गति घायल जाणै जो कोई घायल होय।

जौहरि की गति जौहरी जाणै की जिन जौहर होय। 

सूली ऊपर सेज हमारी सोवण किस बिध होय।


गगन मंडल पर सेज पिया की किस बिध मिलणा होय।


दरद की मारी बन-बन डोलूं बैद मिल्या नहिं कोय।


मीरा की प्रभु पीर मिटेगी जद बैद सांवरिया होय।


                                                      -मीराबाई

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

वस्तु अमोलिक दी म्हारे सतगुरु
किरपा कर अपनायो ।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो 

जनम जनम की पूँजी पाई ।
जग में सभी खोआयो 

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

खरचे न खूटे वाको चोर न लूटे ।
दिन दिन बढ़त सवायो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

सत की नाव खेवटिया सतगुरु ।
भवसागर तर आयो ।
पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

मीरा के प्रभु गिरिधर नागर ।
हरष हरष जस गायो ।।

पायो जी मैंने राम रतन धन पायो ।

प्यार को दोस्ती बताता हूँ

प्यार को दोस्ती बताता हूँ।
झूठ यूँ दिल से बोल जाता हूँ।।

जब भी सोचूँ उसे तन्हाई में।
बाख़ुदा खुद को भूल जाता हूँ।।

उसकी बातें जो याद आती हैं।
मैं अकेले में मुस्कुराता हूँ।।

कभी हारूँ नहीं मैं दिल अपना।
हाँ मगर दिल से हार जाता हूँ।।

आँच आये न उसके दामन पर।
अपनी ही लौ में सुलग जाता हूँ।।

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
मो०-९६५१२९३९८३

जब तुम्हारा दुपट्टा सरकता था Jab tumhara dupatta sarakta tha (Tumne meri mohabbat)

Tumne meri mohabbat ko, jab tumhara dupatta saralta tha

"तूने मेरी मोहब्बत की गहराइयों को समझा ही नहीं सनम..!
तेरे बदन से जब दुपट्टा सरकता था हम नज़रें झुका लेते थे..!!"

Tuney meri mohabbat ki gahraiyon ko samjha hi nahi sanam!!
Terey badan se jab dupatta sarakta tha hum nazre jhuka lete they!!

   यूँ ही कहीं कुछ पढ़ रहा था और नज़र पड़ गयी इन पंक्तियों पर।

प्रथमदृष्टया कोई भी इसे उस सस्ती शेरो-शायरी की श्रेणी में रख सकता है जो ट्रैक्टर की ट्रॉलियों से लेकर बड़े बड़े ट्रकों के आगे-पीछे अक्सर लिखी मिल जाती हैं या चाट-पकौड़ी के ठेले या फिर किसी आशिक़ मिज़ाज नाई की दुकान के किसी कोने में लगी नेहा धूपिया टाइप हिरोइन के अर्धनग्न चित्र के साथ छपी हुई। लेकिन इन पंक्तियों को जब आप दोबारा पढ़ेंगे तो आपको एहसास हो जाएगा कि ये वास्तव में इन सबसे कुछ तो अलग हैं। इसकी भाव-भूमि वह है जिस तक आजकल के हनी सिंह टाइप लौंडे तो पहुँच ही नहीं सकते।


खैर, हम आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं आज के सोशल मीडिया के ज़माने की जहाँ हर कोई अपने आपको खुसरो, ज़ौक़, मीर, ग़ालिब और दुष्यंत कुमार समझता है। जहाँ पहली पंक्ति का तुक दूसरी पंक्ति से मिल जाना ही शायरी मानी जाती है और जहाँ कॉपी-पेस्ट की कला सीख लेना ही शायर बन जाने की गारण्टी है।

अभी कुछ ही दिन पहले की बात है हमारे एक फेसबुकिया मित्र की कालजयी पंक्तियाँ फ़ेसबुक वाल पर चमक रही थीं जो कुछ यूँ थीं-

"जाते जाते उसने कहा मुझसे,
मेरी बेवफाई से ही मर जाओगे या मार के जाऊँ।"

तिस पर सैकड़ों लाइक और कमेन्ट इन पंक्तियों की ख़ूबसूरती में चार-चाँद लगा रहे थे।
अब ऐसी ऐलानिया बेवफ़ाई वाली शायरी से कोई मरे न मरे लेकिन आज के दौर में ग़ालिब साहब ज़िंदा होते तो वो इसे पढ़कर ज़रूर दम तोड़ देते।

     ➢पढ़ें हिंदी का बेहतरीन प्रेम गीत-'रात आधी'

    उधर बड़े दिनों बाद पड़ोस के गाँव का गनेस मिल गया। अरे वही गनेसवा जिसका चक्कर कभी साथ के क्लास की पिरितिया के साथ खूब प्रचारित हुआ था। विज्ञापनों के दौर में हमने भी आधे-अधूरे मन से मान लिया था कि चलो भई होगा तो होगा! वैसे भी हमें सुबह शाम ग्राउण्ड के चक्कर लगाने के बाद और किसी चक्कर का न तो समय होता था और न हिम्मत। लेकिन मुझे इस बात में संशय जरूर था और इसका निराकरण उस दिन हुआ जिस दिन पिरितिया ने भरी क्लास में अपने हाथों की पूरी ताकत का इस्तेमाल गनेसवा के किचकिचे गाल पर किचकिचाकर किया था। चटाक की आवाज़ के साथ ही बेचारे के सपनों का महल भी चकनाचूर हो गया था उसी दिन। और यह प्रचार भी मैगी नूडल्स की तरह बंद हो गया। बेचारे की प्रेम कहानी बिना शुरू हुए ही ख़त्म हो गयी।
 
    गनेसवा बहुत दिनों बाद दिखा था। बेचारे की अंगूर जैसी आँखें सूख के किशमिश हुई जा रहीं थीं। बातों-बातों में पता चला गनेसवा भी आजकल लिख रहा है। मैंने कहा भई मुझे भी सुनाओ कुछ। बेचारे ने थोड़ा सकुचाते हुए सम्भवतः अपनी सर्वश्रेष्ठ रचना कुछ यूँ पेश की-

दर्द की इन्तहा

दर्द की इन्तहा हुई फिर से।
लो तेरी याद आ गयी फिर से।।

फिर कहाँ चढ़ रहा है रंग-ए-हिना,
कहाँ बिजली सी गिर गयी फिर से।।

बंदिशें तोड़ के, ठुकरा के लौट आया है,
दिल को ग़फ़लत सी हो गयी फिर से।।

वही ख़ुशबू जो बस गयी है मेरे सीने में,
अश्क़ बनकर छलक उठी फिर से।।

बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क-९६५१२९३९८३

ग़मों में मुस्कुराना

परिन्दे आँधियों में आशियाना ढूँढ़ लेते हैं !
बंजारे कहीं भी इक ठिकाना ढूँढ़ लेते हैं !!
ग़मों की राह के हम भी मुसाफ़िर थे, मुसाफ़िर हैं,
ग़मों में भी मगर अब मुस्कुराना ढूँढ़ लेते हैं !!

बालकृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
सम्पर्क सूत्र: +91-9651293983

लोग मिलते हैं सवालों की तरह

दोस्तों, बहुत लम्बा वक़्त गुज़र गया। अब सोचता हूँ तो लगता है कैसे गुज़र गया पता ही नहीं चला। यह बात दीगर कि अभी जो बीत रहा है उसको बिता पाना बड़ा मुश्किल है।

ख़ैर ये तो ज़िन्दगी की कश्मकश है जो चलती ही रहनी है। मलाल इस बात का है कि इस भागदौड़ में आपसे रूबरू होने का मौका न मिल पाया। हालाँकि इसमें मेरी लापरवाही भी एक वजह हो सकती है। कोशिश रहेगी कि आगे से ऐसा न होने पाए और ये सिलसिला यूँ ही चलता रहे। इस उम्मीद के साथ चन्द पंक्तियाँ आप की सेवा में ...


ख़्वाब जलते हैं चरागों की तरह !
लोग मिलते हैं सवालों की तरह !!
रोशनी रोशनी में जलती है,
धुन्ध रहती है हिजाबों की तरह !!
वरक़ पलटूँ तो हर्फ़ कहते हैं,
ज़िन्दगी भी कभी खिलती थी गुलाबों की तरह !!

बाल कृष्ण द्विवेदी 'पंकज'
मो0-9651293983